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झारखंड में सरकार गिरना आसान नहीं

Jharkhand government trouble

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी बहुत मजबूत विपक्ष है। उसके 26 विधायक हैं और सहयोगी दलों के भी विधायक हैं। इसके बावजूद भाजपा विपक्ष की भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रही है तो उसका कारण यह है कि 2019 के आखिर में जेएमएम-कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही भाजपा के नेता इसके गिरने की राह देख रहे हैं और इस इंतजार में हैं कि कब उनकी सरकार बने। लेकिन इस विधानसभा में कांग्रेस की सरकार बनना मुश्किल लग रहा है। एक तो भाजपा में भी ज्यादातर बड़े नेता मान रहे हैं कि अब दो-ढाई साल के लिए भाजपा की सरकार बनाने का प्रयास नहीं होना चाहिए। उनकी मंशा है कि अगर सरकार गिरे तो राष्ट्रपति शासन लगाया जाए और फिर मध्यावधि चुनाव हो।

लेकिन सरकार गिरना भी आसान नहीं है। भाजपा के नेता जिन मुकदमों की वजह से सरकार गिरने की उम्मीद लगाए बैठे हैं वे पर्याप्त नहीं हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने नाम से खदान का लाइसेंस लिया या उनकी पत्नी के नाम से जमीन खरीद गई या उनके भाई की कंपनी को खदान का लाइसेंस मिला या उनके मीडिया सलाहकार अभिषेक प्रसाद ने खदान लिया, इन सबसे आपराधिक मामले तो बनते हैं लेकिन इनसे सरकार कैसे गिरेगी? सरकार गिराने के लिए कांग्रेस तोड़ने का भाजपा का कथित अभियान फेल हो चुका है। अब जेएमएम के भीतर शिबू सोरेन परिवार की आंतरिक कलह को आधार बना कर भाजपा नेता सरकार गिरने की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन सभी पुराने नेताओं को पता है कि सोरेन परिवार में किसी भी दूसरे राजनीतिक परिवार की तरह आंतरिक कलह बरसों से चल रही है। उससे पार्टी की राजनीति प्रभावित नहीं होती है।

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जहां तक मुख्यमंत्री के खिलाफ लाभ के पद का मामला है तो पार्टी ने राज्यपाल से मिल कर पक्ष रख दिया है और सरकार की ओर से चुनाव आयोग को भी जवाब भेजा जाएगा। जिस खदान का मुख्यमंत्री के नाम से आवंटन हुआ था वह जमीन पहले से उनके नाम से थी। सरकार का कहना है कि उन्होंने कंसेट टू ऑपरेट यानी सीटीओ के लिए आवेदन नहीं किया था इसका मतलब है कि उनकी मंशा इससे लाभ कमाने की नहीं थी। इसके बावजूद अगर चुनाव आयोग सदस्यता खत्म करता है तब भी उससे सरकार के बहुमत पर असर नहीं होता है। ऐसा होने पर हेमंत सोरेन की जगह कोई और मुख्यमंत्री बन जाएगा।

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