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अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे राज्य?

वस्तु व सेवा कर, जीएसटी कौंसिल की बैठक में केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को जो सुझाव दिए गए और बाद में वित्त सचिव ने चिट्ठी लिख कर जो सलाह दी है, उसे विपक्षी पार्टियों के शासन वाला कोई भी राज्य स्वीकार नहीं कर रहा है। यहां तक कि तमिलनाडु की सरकार भी, जो भाजपा की सहयोगी है वह भी इसे मानने को तैयार नहीं है। विपक्षी शासन वाले ज्यादातर राज्यों ने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है। वे अपने सिर पर कर्ज लेने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार को जीएसटी मुआवजे की रकम देनी होगी। दिल्ली के मुख्यंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि जीएसटी की वसूली कम होने पर राज्यों को मुआवजा देने का प्रावधान, जीएसटी की पूरी अवधारणा का केंद्रीय स्तंभ है, उसी पर जीएसटी का पूरा सिद्धांत टिका है, सरकार उसे नहीं बदल सकती हैं।

अगर राज्य यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं कि वे अपने खाते में आरबीआई या बाजार से कर्ज लें और जीएसटी की वसूली से उसे चुकाया जाए तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। एक बार यह रास्ता खुल गया तो उसका कोई अंत नहीं है। फिर हमेशा, जब भी जीएसटी की वसूली कम होगी तो राज्यों से कर्ज लेने को कहा जा सकता है। मुआवजा चुकाने की अवधि तो पांच साल तक ही है यानी 2022 तक है इसलिए मामला सिर्फ मुआवजे के भुगतान में देरी का नहीं है, बल्कि जीएसटी में राज्यों के हिस्से के भुगतान का भी है। अगर एक बार यह रास्ता खुला तो आगे हो सकता है कि जीएसटी की वसूली में कमी होने पर राज्यों को उनका हिस्सा देने की बजाय केंद्र कहे कि वे कर्ज ले लें, ब्याज चुकाएं और जीएसटी की भविष्य में होने वाली वसूली से कर्ज चुकाएं। यह एक दुष्चक्र बन जाएगा, जिसमें कोई राज्य फंसना नहीं चाह रहा है। तभी राज्यों ने दो टूक कहा है कि वे कर्ज नहीं लेंगे, केंद्र सरकार आरबीआ या बाजार या कहीं से कर्ज ले और राज्यों को उनके हिस्से का भुगतान करे।

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