जीएसटी से कड़की के संकट का पहले से पता

वित्त मंत्रालय के सचिव अजय भूषण पांडेय ने तो पिछले हफ्ते संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति को बताया कि केंद्र सरकार के पास वस्तु व सेवा कर, जीएसटी के मद में इतने पैसे नहीं हैं कि वह राज्यों को उनका हिस्सा दे सके। यह खबर आने के बाद माना गया कि कोरोना वायरस के संकट की वजह से सरकार की यह हालत हुई है और कोरोना का संकट खत्म हो जाएगा तो स्थिति सुधार सकती है। पर ऐसा नहीं है। आर्थिक स्थिति कोरोना संकट के पहले से बिगड़ने लगी थी और केंद्र सरकार को भी इसका अंदाजा हो गया था कि वह जीएसटी में राज्यों का तय हिस्सा देने की स्थिति में नहीं रहेगी। तभी सरकार ने मार्च से ही इस बात की तैयारी शुरू कर दी थी कि किसी तरह से वह जीएसटी राजस्व में बंटवारे के फार्मूले को बदल सके या उससे बाहर निकल सके।

इसके लिए केंद्र सरकार ने मार्च में ही कानूनी सलाह मांगी थी। केंद्र ने देश के सबसे बड़े कानूनी अधिकारी अटॉर्नी जनरल से मार्च में ही इस बारे में राय मांगी थी। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सरकार को राय दी है कि वह जीएसटी में तय फार्मूले के हिसाब से राज्यों को हिस्सा देने के लिए बाध्य नहीं है। इसका मतलब है कि सरकार फार्मूला बदल सकती है। सोचें, मार्च में जब कोरोना का संकट शुरू ही हुआ था उसी समय सरकार की आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई थी कि वह जीएसटी कौंसिल में तय किए गए और संसद से पास कानून को बदलने की सोच में लग गई थी। उसी समय तय हो गया था कि सरकार अगस्त से जीएसटी के मुआवजे का बकाया चुकाने की स्थिति में नहीं है। अब तय मानें कि केंद्र सरकार जीएसटी कौंसिल में फार्मूला बदलवाने का प्रयास करेगी और राज्यों को उनके हालात पर छोड़ेगी। जिस तरह से केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस के संक्रमण की वैश्विक महामारी में अपने नागरिकों को कर्ज लेकर काम चलाने के लिए कहा है उसी तरह राज्यों से भी कहा जा रहा है कि वे कर्ज लेकर काम चलाएं, केंद्र सरकार उनके हिस्से के वसूले गए कर में भी उनका हिस्सा देने की स्थिति में नहीं है।

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