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विपक्षी एकता की पहल कौन करेगा?

डेढ़ साल पहले जिस तरह से कर्नाटक में सारे विपक्षी नेता जुटे थे, उस तरह का जमावड़ा झारखंड में होने जा रहा है। रविवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शपथ समारोह में कांग्रेस और लेफ्ट सहित तमाम भाजपा विरोधी पार्टियों के नेता जुटेंगे। तमिलनाडु के एमके स्टालिन से लेकर कर्नाटक के एचडी देवगौड़ा और महाराष्ट्र में शरद पवार व उद्धव ठाकरे से लेकर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तक तो न्योता दिया गया है। ज्यादातर विपक्षी नेता शपथ समारोह में शामिल भी हो रहे हैं। कर्नाटक में भी ऐसा ही हुआ था। जब कांग्रेस और जेडीएस की साझा सरकार बनी थी तब राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी और मुलायम सिंह तक सब शपथ समारोह में शामिल हुए थे।

पर उस समय लोकसभा चुनाव को लेकर जोश और उम्मीदें थीं। तभी चंद्रबाबू नायडू से लेकर ममता बनर्जी तक कई नेता विपक्षी एकता की पहल कर रहे थे। पर अब बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष की सभी पार्टियों का आपसी विवाद खत्म करा कर उनको एकजुट करने का प्रयास कौन करेगा? तमाम भाजपा विरोधी पार्टियों के नेता भले रांची में जुट रहे हैं पर उनके आपसी विवाद खत्म नहीं हुए हैं। सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने दो टूक अंदाज में कहा है कि वे तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे। इसी तरह समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को भी एक मंच पर लाना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। विपक्षी एकता की पहल करने वाले चंद्रबाबू नायडू लोकसभा और विधानसभा दोनों का चुनाव हारने के बाद किसी तरह से एनडीए में ही वापस लौट जाने की जुगाड़ में लगे हैं। बाकी तीन क्षत्रप- एमके स्टालिन, जगन मोहन रेड्डी और के चंद्रशेखर राव अपने प्रदेश से आगे की सोचने  वाले नहीं हैं। इनका अखिल भारतीय एक्सपोजर भी नहीं है। इसलिए दक्षिण भारत के किसी क्षत्रप से विपक्षी एकता की पहल के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। समाजवादी नेताओं में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव तीनों अलग अलग कारणों से ऐसी स्थिति में हैं कि वे धुरी नहीं बन सकते हैं।

सो, ले-देकर शरद पवार बचते हैं, जिनसे विपक्ष को कुछ उम्मीद है। अगर पवार पहल करते हैं तो राज्यों में टुकड़ों-टुकड़ों में बन रहे गठंबधन को एक राष्ट्रीय शक्ल दे सकते हैं। पर इसमें भी कांग्रेस के कई नेता आशंकित हैं। उनको लग रहा है कि अगर राष्ट्रीय गठबंधन बनाया गया तो भाजपा को ध्रुवीकरण कराने का मौका मिलेगा। कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि अभी नरेंद्र मोदी के मुकाबले जीतने लायक एकजुटता संभव नहीं है। इसलिए राज्यों में गठबंधन बनाना और लोकसभा में 2004 जैसा ढीला ढाला गठबंधन ही ठीक करेगा।

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