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अब मंत्रियों से कैसे बात करेंगा किसान?

भारत सरकार के चार मंत्री किसानों से बात कर रहे हैं। रूटीन की वार्ता कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेल मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री सोम प्रकाश के जिम्मे थी और एक दिन औचक वार्ता गृह मंत्री अमित शाह ने की। रूटीन में बात कर रहे मंत्रियों ने कहना शुरू कर दिया है कि किसानों के आंदोलन में वामपंथी, नक्सली और माओवादी शामिल हो गए हैं। एक अखबार की रिपोर्ट और फोटो दिखा कर तोमर ने सवाल उठाया कि दंगे आदि में शामिल लोगों की रिहाई की मांग करने के पोस्टर किसान आंदोलन में क्यों दिख रहे हैं। उन्होंने उमर खालिद, सर्जिल इमाम आदि कि रिहाई की मांग वाले पोस्टर का हवाला देकर कहा कि यह किसानों की मांग कैसे हो सकती है। इस तरह उन्होंने किसान आंदोलन को कथित टुकड़े टुकड़े गैंग के साथ जोड़ दिया।

सरकार के दूसरे वार्ताकर पीयूष गोयल ने आरोप लगाया कि आंदोलन पर नक्सली और माओवादियों ने कब्जा कर लिया है और किसान उनके असर से निकलेंगे तब उनको पता चलेगा कि केंद्र सरकार का बनाया कृषि बिल उनके लिए कितना फायदेमंद है। अब सोचें ऐसे मंत्रियों के साथ किसान कैसे बात करेंगे, जो किसानों के आंदोलन की साख बिगाड़ रहे हैं? राव साहेब दानवे जैसे दूसरे मंत्री आंदोलन को चीन-पाकिस्तान से जोड़ रहे है वह अलग बात है। लेकिन जो मंत्री वार्ता में शामिल हैं, जिनके ऊपर समाधान निकालने की जिम्मेदारी है अगर वे ही आंदोलन को नक्सलियों, माओवादियों और टुकड़े टुकड़े गैंग का समझ रहे हैं तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? वे कैसे किसानों की बात सुनेंगे या समझेंगे? उन्हें इतनी बुनियादी बात समझ में नहीं आ रही है कि पंजाब और हरियाणा के किसान इतनी ठंड में 18 दिन से आंदोलन कर रहे हैं तो अपनी चिंता में, अपनी फसल की कीमत की चिंता में, अपनी जमीन छिन जानी की चिंता में कर रहे हैं, किसी माओवादी, नक्सली सरोकार की चिंता में नहीं कर रहे हैं! उन्हें हकीकत पता है पर वे आंदोलन की साख खराब करने पर तुले हैं।

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