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राजरंग| नया इंडिया|

चुनाव हर साल हो तो अच्छा!

नरेंद्र मोदी जिस दिन से प्रधानमंत्री बनें हैं उस दिन से एक देश, एक चुनाव की बात कर रहे हैं, लेकिन उसके बाद से ही जिस तरह चुनाव आयोग एक-एक राज्य में आठ-आठ चुनाव करा रहा है उससे लगता है कि प्रधानमंत्री यह बात मजाक में कहते हैं। असल में वे भी चाहते हैं कि चुनाव कई चरणों में हो ताकि वे सब जगह जाकर प्रचार कर सकें। हो सकता है कि हर साल कई चरणों में होने वाले मतदान उनके लिए अच्छे हों लेकिन यह देश के लोगों के लिए अच्छा है कि हर साल चुनाव होता रहे।

जैसे इसी साल देखें, जब से चुनाव की घोषणा हुई है तब से एक बार भी पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़े हैं। उससे पहले तीन महीने का रिकार्ड उठा कर देखें। दिसंबर से फरवरी के अंत तक 30 बार से ज्यादा दाम बढ़े थे और दोनों ईंधनों की कीमत में प्रति लीटर 10 रुपए से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। रसोई गैस के सिलिंडर की कीमत तो दिसंबर से फरवरी के बीच दो सौ से ज्यादा बढ़ गई। लेकिन फरवरी के अंत में चुनाव की घोषणा हुई और उसके बाद से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने बंद हो गए। उलटे पिछले डेढ़ महीने में पेट्रोल-डीजल के दामों में 60-60 पैसे की बड़ी कमी भी हुई है। यह अलग बात है कि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 10 डॉलर प्रति बैरल कम हो गई है।

सोचें, अगर चुनाव नहीं होता तो एक अप्रैल से आम लोगों की लघु बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज की क्या स्थिति होती? चुनाव खत्म होने के बाद तो लघु बचत की ब्याज दरों में कटौती निश्चित होगी लेकिन अभी तो पश्चिम बंगाल के चुनाव ने बचा लिया लोगों को। सरकार ने तो ऐलान कर दिया था कि तमाम लघु बचत योजनाओं पर, जिनमें बुजुर्गों की योजना से लेकर सुकन्या समृद्धि और किसान विकास पत्र तक शामिल थे, उन पर ब्याज दर 0.7 से 1.1 फीसदी तक की कटौती की घोषणा कर दी गई थी। एक अप्रैल से इसे लागू होना था पर सुबह अचानक पता चला कि एक अप्रैल को तो मतदान होना है, सो फटाफट ब्याज दरों में कटौती का फैसला वापस हो गया। सोचें, चुनाव नहीं होता तो क्या होता?

ऐसे ही तीन-चार दिन पहले खाद बनाने वाली कंपनियों ने कीमत बढ़ाने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि खाद में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमतें महंगी हो गई हैं इसलिए खाद की कीमत में 46 से 58 फीसदी तक की बड़ी बढ़ोतरी का ऐलान किया गया। लेकिन अगले ही दिन सरकार की एक बड़ी उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसके बाद खाद कंपनियों से कहा गया कि वे कीमत नहीं बढ़ाएं। फिर केंद्रीय मंत्री ने ऐलान किया कि कीमतें नहीं बढ़ेंगी। सोचें, खाद की कीमतें सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं, फिर भी सरकार ने कीमत में बढ़ोतरी रूकवाई। चुनाव की वजह से यह संभव हुआ। अगर चुनाव नहीं होते तो खाद की कीमत डेढ़ गुनी हो गई होती। हालांकि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! चुनाव खत्म होंगे तो पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ेंगे, लघु बचत पर ब्याज दर भी कम होगी और खाद भी महंगा होगा।

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