चीन का नाम लेने से क्यों परहेज?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर इस सरकार के शीर्ष पांच मंत्रियों में से कोई भी चीन का नाम लेकर उसके ऊपर हमला नहीं कर रहा है। दूसरे मंत्री चीन को निशाना बना रहे हैं। जैसे अमेरिका के साथ टू प्लस टू वार्ता के दिन ही नितिन गडकरी ने चीन पर निशाना साधा। लेकिन अमेरिका के साथ वार्ता में शामिल दोनों शीर्ष मंत्रियों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन का नाम नहीं लिया। हालांकि दोनों ने चीन का नाम लिए बिना उस पर हमला किया। वे किस को लक्ष्य करके अपनी बात कर रहे हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं है। किसकी विस्तारवादी नीतियों की आलोचना हो रही है और किसके आक्रामक बरताव से भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा का संकल्प किया जा रहा है, यह भी स्पष्ट है। पर चीन का नाम नहीं लेना है।

ऐसा लग रहा है कि भारत ने अपनी किसी खास कूटनीति और सामरिक रणनीति के तहत यह तय किया है कि चीन का नाम नहीं लेना है। तभी प्रधानमंत्री भी चीन का नाम नहीं लेते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि चीन के साथ चल रही सैन्य व कूटनीतिक वार्ताओं को पटरी से उतरने से बचाने के लिए भारत उसका नाम नहीं ले रहा है। परंतु ऐसी कोई बाधा अमेरिका के सामने नहीं है। सो, भारत की जमीन पर खड़े होकर अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन पर निशाना साधा। गलवान घाटी में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को याद किया और कहा कि चीन की विस्तारवादी नीतियों और उसकी आक्रामकता के खिलाफ अमेरिका हमेशा भारत के साथ खड़ा है। पोम्पियो की बातों से चीन इतना भड़का है कि उसने बयान जारी करके कहा कि वे चीन और इस क्षेत्र के दूसरे देशों के बीच फूट डाल रहे हैं।

अमेरिका के साथ इस वार्ता के बाद जब यह बात उठी कि अमेरिका के मंत्री चीन का नाम लेकर हमला कर रहे हैं और भारत बिना नाम लिया हमला कर रहा है तो सबसे रोचक प्रतिक्रिया भाजपा के सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी की रही। उन्होंने ट्विट करके कहा कि वे ऐसी पत्नियों के बारे में जानते हैं, जो पति का नाम नहीं लेती हैं। यह चीन के प्रति प्रधानमंत्री की विदेश नीति पर सीधा हमला है। ध्यान रहे स्वामी लगातार भारत की विदेश नीति और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं।

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