चीन का नाम नहीं लेने का मुद्दा क्यों बन रहा है?

यह मजाक का विषय बन गया है कि प्रधानमंत्री ने चीन का नाम लिया या नहीं? प्रधानमंत्री जब भी भारत और चीन के बीच सीमा पर चल रहे विवाद के बारे में कुछ कहते हैं तो विपक्ष के नेता पूछते हैं कि चीन का नाम क्यों नहीं लिया। प्रधानमंत्री लद्दाख गए और दो जगह भाषण दिया तब भी पूछा गया कि चीन का नाम क्यों नहीं लिया। गलवान घाटी की घटना के बाद सर्वदलीय बैठक हुई और प्रधानमंत्री ने बयान दिया तब भी पूछा गया कि चीन का नाम क्यों नहीं लिया। सवाल है कि चीन का नाम लेना क्यों जरूरी है? क्या प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उससे स्पष्ट नहीं हो रहा है कि वे किसके बारे में कह रहे हैं? चीन को तो समझ में आ जा रहा है कि उसके बारे में कहा जा रहा है, फिर विपक्ष या विरोधी क्यों नहीं समझ रहे हैं?

प्रधानमंत्री ने लद्दाख में कहा कि विस्तारवादी नीतियों के दिन खत्म हो गए तो इस पर तत्काल चीन ने प्रतिक्रिया दी और कहा कि उसे विस्तारवादी नहीं कहा जाए। जाहिर है सारी दुनिया समझ गई कि प्रधानमंत्री ने किसको विस्तारवादी बताया। पर भारत में विपक्ष पूछने लगा कि चीन का नाम क्यों नहीं लिया। आमतौर पर कूटनीतिक और सामरिक मामले में विवाद के समय देशों का नाम लेने से बचा जाता है। संसद से लेकर लाल किले तक या संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर दूसरे किसी बहुपक्षीय मंच पर शायद ही कभी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान का भी नहीं लिया होगा। लेकिन जैसे ही कहा जाता है कि पड़ोसी देश आतंकवाद फैला रहा है, वैसे ही सब समझ जाते हैं कि पाकिस्तान की बात हो रही है। नरेंद्र मोदी ही नहीं कोई भी प्रधानमंत्री किसी देश का नाम लेकर उसकी आलोचना नहीं करता है। कूटनीतिक या सैन्य चैनल से होने वाली आधिकारिक बातचीत में जरूर देशों का नाम लिया जाता है पर सार्वजनिक रूप से कम से कम प्रधानमंत्री देशों का नाम नहीं लेते हैं।

One thought on “चीन का नाम नहीं लेने का मुद्दा क्यों बन रहा है?

  1. पुरानी कहावत सुनी थी ,जबरा मारे और रोने न दे। लोग सोच रहे है कही ऐसा तो नही है, जबरा मारे डराये ,बोलने भी न दे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares