चीन की भाषा पर आपत्ति की जानी चाहिए

प्रधानमंत्री ने अच्छा किया, जो उन्होंने चीन की विस्तारवादी नीति की आलोचना की और कहा कि विस्तारवादी नीति पर चलने वाले मिट गए हैं। अब चीन की कूटनीतिक भाषा पर भी सवाल उठाया जाना चाहिए और भारत की ओर से आधिकारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई जानी चाहिए। चीन भारत के साथ ऐसे बरताव नहीं कर सकता है जैसे वह अपने किसी अधीनस्थ देश के साथ बात कर रहा हो। प्रधानमंत्री के लद्दाख में दिए भाषण के बाद भी चीन की जैसी टिप्पणी है वह बहुत खराब नजीर बनाने वाली है और भारत को इस पर आपत्ति करनी चाहिए।

उसने एक तो धमकी देने के अंदाज में कहा कि चीन के बारे में भारत स्ट्रेटिजिक मिसकैलकुलेशन न करे यानी सामरिक रूप से गलतफहमी में न रहे। ध्यान रहे भारत के तमाम रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों की लडाई में चीन के मुकाबले भारत को एडवांटेज है और यह भी कहा जा रहा है कि जमीनी लड़ाई में वियतनाम जैसे देश ने चीन को परास्त किया हुआ है। भारत ने भी 1967 और 1975 में चीन के छक्के छुड़ाए थे। तभी चीन धमकी की भाषा में बात कर रहा है। दूसरे, चीन बार बार अपने बयान में लिख रहा है कि भारत को उसके साथ काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के लद्दाख दौरे के बाद भी चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में भी यहीं कहा गया कि उसे उम्मीद है कि भारत उसके साथ काम करेगा। कूटनीति में ऐसा नहीं होता है। छोटा से छोटा देश हो तब भी कहा जाता है कि दोनों देश मिल कर काम करेंगे। पर चीन बार बार अपने बयानों में भारत का दर्जा घटा रहा है। भारत को तत्काल इस पर सख्त शब्दों में आपत्ति करनी चाहिए।

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