टेस्टिंग में देरी हुई तो बहुत मरेंगे

हैरानी की बात है कि भारत में कोरोना वायरस की टेस्टिंग को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय और इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर की जो प्रेस कांफ्रेंस रोज होती है, उसमें यह बताया जाता है कि कितने बेड्स तैयार कर दिए गए, कितने डेडिकेटेड अस्पताल बन गए, कितने मरीज हो गए, कितने ठीक हो गए और जब टेस्टिंग के बारे में पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि भारत के पास टेस्टिंग कैपिसिटी पूरी है पर अभी ज्यादा टेस्टिंग करेंगे नहीं। याद करें प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्र के नाम अपने संदेश में बताया कि सरकार ने 602 डेडिकेटेड कोरोना अस्पताल बना दिए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अभी बेड्स की जरूरत बहुत कम है पर एक लाख बेड्स तैयार कर दिए गए हैं। पर टेस्टिंग के बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

आईसीएमआर की ओर से बार-बार कहा गया कि टेस्ट की क्षमता पूरी है। फिर भी 14 अप्रैल तक ढाई लाख टेस्ट करने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। सवाल है कि जब क्षमता में कमी नहीं है तो टेस्ट हो क्यों नहीं रहे हैं? क्या सरकार संक्रमितों की संख्या को जान बूझकर कम दिखाना चाहती है और इसी वजह से टेस्टिंग नहीं बढ़ाई जा रही है? लेकिन यह समझ लेना होगा कि ऐसा करना बहुत खतरनाक है। मुंबई के आंकड़ों से यह प्रमाणित हो गया है कि टेस्ट कम करने या उसमें देरी करने से मरने वालों की संख्या बढ़ेगी। मुंबई का आंकड़ा है कि शुरुआत के 50 मरीजों में से ज्यादा की मौत अस्पताल पहुंचने के चंद घंटों के अंदर ही हो गई। इसके बाद कुछ मरीज एक-दो दिन में मर गए। इसका साफ मतलब है कि जांच में देरी हुई और इसी वजह से उनका अस्पताल पहुंचने में देरी हुई। तभी इसकी गंभीरता को समझते हुए सरकार को जांच की संख्या बढ़ानी चाहिए और जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी बढ़ानी चाहिए।

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