आंतरिक मामलों में टिप्पणी का सवाल

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने भारत में कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन के समर्थन में बयान दिया था तो भारत सरकार ने गहरी नाराजगी जाहिर की थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ्रेंस करके और विदेश मंत्रालय ने कनाडा के राजनयिक को बुला कर चेतावनी दी थी कि कनाडा को भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। हालांकि इससे ट्रुडो की सेहत पर खास फर्क नहीं पड़ा। भारत के नाराजगी जताने के बाद भी उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी शांतिपूर्ण आंदोलन का वे समर्थन करते रहेंगे।

अब इस मसले पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि भारत ने लगातार कई देशों के आंतरिक मामलों में टिप्पणी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका में कैपिटल हिल में हुई हिंसा और लोगों के प्रदर्शन पर टिप्पणी की। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि गैरकानूनी प्रदर्शनों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नहीं बदला जा सकता है। इस पर सवाल उठाने वालों में भाजपा के सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी भी हैं। उन्होंने ट्रंप का सबसे मददगार राष्ट्रपति बताते हुए कहा है कि भारत को अमेरिका के आंतरिक मामलों में बयान नहीं देना चाहिए।

बहरहाल, अमेरिका इकलौता देश नहीं है, जिसके आंतरिक मामलों में भारत ने टिप्पणी की है। भारत ने श्रीलंका के आंतरिक घटनाक्रम पर भी टिप्पणी की है। तमिलों के अधिकार देने के मामले में भारत की टिप्पणी पर श्रीलंका ने नाराजगी भी जताई। वहां के एक केंद्रीय मंत्री शरत वीराशेखरा ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि वह उसके आंतरिक मामलों में दखल न दे। पाकिस्तान के मामले में तो भारत हमेशा ही टिप्पणी करता रहता है। पिछले दिनों वहां एक मंदिर पर हमला हुआ, जिसके पुनर्निमाण का आदेश वहां की सर्वोच्च अदालत ने दिया है पर इस पर भारत ने भी टिप्पणी की।

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