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आदिवासी, अल्पसंख्यक वोट का ध्रुवीकरण

झारखंड के विधानसभा चुनाव नतीजे का एक बड़ा सबक भाजपा के लिए यह है कि उसे अब आदिवासी वोटों की चिंता करनी होगी। छत्तीसगढ़ के बाद उसे झारखंड में भी बडा झटका लगा है। पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ दें तो देश के ये दो ही प्रदेश हैं, जहां आदिवासी आबादी सबसे बड़ी है। इन दोनों में से पहले भाजपा को पहले छत्तीसगढ़ में झटका लगा और अब झारखंड में लगा है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की नाराजगी का असर यह हुआ कि जिस राज्य में जीत हार का अंतर एक से दो फीसदी का होता था वहां भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले दस फीसदी वोट कम मिले। 90 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा सिर्फ 15 सीट जीत पाई और कांग्रेस ने 68 सीटें जीत कर सरकार बनाई।

छत्तीसगढ़ के नतीजे से सबक लेकर भाजपा ने इस साल लोकसभा के चुनाव में अर्जुन मुंडा को मैदान में उतारा और जीतने के बाद उनको केंद्र में मंत्री बनाया। पर इसका भी कोई खास असर झारखंड में नहीं दिखा है। गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का प्रयोग इस बार चुनाव में कारगर नतीजे नहीं दे सका है। वैसे भाजपा 36 फीसदी से ज्यादा वोट लेकर सबसे आगे रही है पर आदिवासी और उसके साथ अल्पसंख्यक वोटों के जुड़ जाने से भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। इस चुनाव नतीजे का एक सबक भाजपा के लिए यह है कि उसे अगर पूर्वी भारत में खास कर झारखंड, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में प्रदर्शन ठीक करना है तो आदिवासी वोटों पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि आदिवासी अकेले नतीजों को नहीं प्रभावित कर सकते हैं। पर अगर वे अल्पसंख्यक की मानसिकता में भाजपा को हराने के लिए वोट करते हैं तो उससे भाजपा को नुकसान होता है। झारखंड में भी यहीं हुआ है। आदिवासी नाराज थे और इसके बाद मुस्लिम और ईसाई उसके साथ हो लिए। इसी से जेएमएम और कांग्रेस को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है।

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