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संवैधानिक संस्थाओं की आंखमिचौली

इससे पहले संभवतः आजाद भारत के इतिहास में संवैधानिक संस्थाओं के राजनीति का हिस्सा बनने और पार्टियों के साथ आंखमिचौली खेलने की ऐसी मिसाल नहीं थी, जैसी अब देखने को मिल रही है। केंद्र से लेकर कई राज्यों में अनेक मिसालें बन गई हैं। लेकिन झारखंड का मामला सबसे दिलचस्प है। राज्य में सत्तारूढ़ जेएमएम और कांग्रेस गठबंधन के साथ भाजपा की राजनीतिक लड़ाई चल रही है। लेकिन इस लड़ाई में संवैधानिक संस्थाएं भी एक पक्ष की तरह आंखमिचौली खेल रही हैं। आंखमिचौली के इस खेल में चुनाव आयोग से लेकर झारखंड के राज्यपाल और विधानसभा स्पीकर सहित कई संस्थाएं शामिल हैं।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ लाभ के पद के मामले की भाजपा नेताओं की शिकायत राज्यपाल के जरिए चुनाव आयोग तक पहुंची थी, जिस पर कोई तीन महीने सुनवाई हुई। पिछले महीने 18 अगस्त को अंतिम सुनवाई और लिखित जवाब दाखिल होने के एक हफ्ते बाद 25 अगस्त को चुनाव आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को भेजी। इस रिपोर्ट में क्या लिखा है वह आधिकारिक रूप से किसी को पता नहीं है। लेकिन पहले दिन से माना जा रहा है कि आयोग ने मुख्यमंत्री की सदस्यता खत्म करने की सिफारिश की है। एक हफ्ते से ज्यादा समय से राज्यपाल उस रिपोर्ट को लेकर बैठे हैं। उसकी अधिसूचना जारी नहीं होने से राज्य में अनिश्चितता की स्थिति है।

इसी तरह भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी की सदस्यता का मामला विधानसभा स्पीकर के पास लंबित है। दिसंबर 2019 में विधानसभा चुनाव के थोड़े दिन बाद ही मरांडी ने अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर दिया था। पर उनकी पार्टी के तीन विधायकों में से दो ने उनके फैसले को चुनौती दी और खुद असली पार्टी होने का दावा करते हुए कांग्रेस में विलय का ऐलान कर दिया। दोनों विधायकों ने मरांडी की और मरांडी ने दोनों विधायकों की सदस्यता रद्द करने का प्रस्ताव स्पीकर को दिया। पिछले ढाई साल से ज्यादा समय से इस पर फैसला अटका है। माना जा रहा है कि अगर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता जाती है तो स्पीकर बाबूलाल मरांडी की सदस्यता भी रद्द करेंगे। सोचें, राज्यपाल और स्पीकर दोनों संवैधानिक संस्थाएं हैं लेकिन दोनों राजनीतिक कारणों से फैसला रोक कर बैठे हैं।

इसी तरह का एक दिलचस्प मामला अदालतों का है। मुख्यमंत्री और उनके परिजनों की कथित फर्जी कंपनियों की जांच सीबीआई को देने का मामला हाई कोर्ट में लंबित है और उस पर एक अपील सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। लेकिन महीनों से फैसला नहीं हो रहा है। सबसे दिलचस्प मामला लोकपाल का है। लोकपाल आंदोलन का फायदा लेकर ही 2014 में भाजपा चुनाव जीती थी लेकिन उस लोकपाल के पास शिबू सोरेन से जुड़ा एक मामला एक साल से ज्यादा समय से लंबित है और फैसला नहीं आ रहा है। ये संवैधानिक संस्थाओं का हाल है, केंद्रीय एजेंसियों की राजनीतिक छापेमारी को छोड़ दें!

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