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आजादी गीत की शुरुआत कहां हुई थी

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने आजादी गीत को बेहद लोकप्रिय बना दिया है। वे हर जगह यह गीत गाते हैं। पिछले दिनों फिल्म अभिनेत्री दीपिका पदुकोण जेएनयू कैंपस में पहुंची तो उनके सामने भी कन्हैया ने आजादी गीत गाया। फिर छात्रों ने मंडी हाउस से राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया तो वहां भी वे इस गीत का सामूहिक गायन हुआ और जामिया इलाके के शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन में शामिल होने कन्हैया पहुंचे तो वहां भी उन्होंने सामूहिक रूप से यह गीत गाया। इस बीच सोशल मीडिया में इस बात को लेकर बहस चल रही है कि इसकी शुरुआत कहां से हुई थी और इसका संदर्भ क्या था। असल में इस गीत का संदर्भ अलग अलग जगहों पर बदलता रहा है।

कश्मीरी पंडितों की भयावह त्रासदी पर बनी फिल्म शिकारा में इसे एक अलग संदर्भ में दिखाया गया है। बताया जा रहा है कि इसकी शुरुआत पाकिस्तान से हुई थी, जहां महिलाओं की आजादी के लिए यह तराना गाया जाता था। वहां से यह कश्मीर पहुंचा, जहां बिल्कुल अलग संदर्भ में इसका इस्तेमाल किया गया और वहां से यह जेएनयू पहूंचा, जहां इसका संदर्भ और बदल गया। महिलाओं की आजादी का तराना घाटी में हिंदुओं से आजादी के तराने में बदल गया और वहीं जेएनयू में आकर भूख, गरीबी, तानाशाही आदि से आजादी के गीत में बदल गया। बहरहाल, संदर्भ भले बदले हों पर हर समय में यह तराना बेहद लोकप्रिय रहा है और तभी कहा जा रहा है कि इसका विरोध करने वाली भाजपा भी ऐसे लेखक और गायक खोज रही है, जो उनके लिए भी एक आजादी का तराना बना सकें।

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