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कल्याण सिंह और मंडल बनाम कमंडल

kalyan singh

kalyansingh mandal vs kamandal आज अपने निधन के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भारतीय जनता पार्टी के लिए मंडल और कमंडल दोनों का प्रतीक हैं। उनके हिंदू हृदय सम्राट होने का भी प्रचार हो रहा है तो बहुत बारीकी से इस बात पर भी फोकस बनाया गया है कि वे पिछड़ी जाति से आते थे और उन्होंने उत्तर प्रदेश में भाजपा को गैर यादव पिछड़ी जातियों के बीच लोकप्रिय बनाया था। यह काफी हद तक सच है कि उनको मुख्यमंत्री बनने के बाद गैर यादव पिछड़ी जातियों में भाजपा का आधार मजबूत हुआ था। लेकिन यह भी हकीकत है कि वे मंडल की काट के लिए शुरू की गई कमंडल यानी मंदिर की राजनीति का प्रतीक चेहरा थे। वे असल में मंडल की राजनीति के एंटीडॉट थे। इस बात को उन्होंने समझ लिया था और तभी सार्वजनिक रूप से कहा था कि भाजपा ओबीसी विरोधी पार्टी हो गई है। यही कह कर उन्होंने दो बार भाजपा छोड़ी थी।

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यह बार बार दिखाया और कहा जा रहा है कि कल्याण सिंह ने कहा था कि उनके खून की बूंद बूंद में भाजपा और संघ के संस्कार हैं। लेकिन यह किसी को याद नहीं है कि उन्होंने किस वजह से दो बार भाजपा छोड़ी थी। कल्याण सिंह ने पहली बार दिसंबर 1999 में पार्टी छोड़ी थी, जब लगातार दूसरी बार केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी। सोचें, केंद्र में लगातार दूसरी बार भाजपा की सरकार बनी और भाजपा के उस समय के हिंदू हृदय सम्राट ने पार्टी छोड़ दी। जाहिर है सरकार में अपनी कोई भूमिका नहीं बनने से वे नाराज थे।

इसके बाद वे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जनवरी 2004 में भाजपा में लौट गए। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने फिर भाजपा छोड़ दी। इस बार उन्होंने कहा कि भाजपा में लौटना उनकी बड़ी राजनीतिक गलती थी। उसी समय उन्होंने कहा था कि भाजपा में ओबीसी नेताओं की इज्जत नहीं है। लेकिन आज वही कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व के साथ साथ ओबीसी वोट के लिए भाजपा की उम्मीदों का आधार बने हैं।

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