सिब्बल खुद मिसाल क्यों नहीं बनते?

कपिल सिब्बल अपनी पोजिशन को लेकर बहुत अहंकार में रहते हैं। वे बिना शक देश के नंबर एक वकील हैं। अच्छा वक्ता भी हैं और राज्यसभा में जाने के लिए उनको कभी भी कांग्रेस के नेतृत्व की मदद की दरकार नहीं होती है। इस बात का उनको बहुत अहंकार है। वे मानते हैं कि कुछ भी कह सकते हैं। इसलिए मौका खोज कर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बयान देना उनकी फितरत है। अब उनको लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी प्रभावी विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है। यह बात उन्होंने पिछले तीन महीने में दूसरी बार कही है। लेकिन वे यह नहीं बता रहे हैं कि आखिर कैसे कांग्रेस को प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए। नेतृत्व बदलने के अलावा उसे क्या क्या करना चाहिए?

असल में सिब्बल ने कभी खुद जमीनी राजनीति नहीं की है। इसलिए उनको अंदाजा नहीं है कि जमीनी राजनीति क्या होती है, आंदोलन क्या होता है, प्रभावी विपक्ष क्या होता है। उनसे कोई आदमी नहीं पूछ रहा है कि वे दिल्ली की चांदनी चौक सीट से दो बार सांसद रहे। वहां से चुनाव हार गए तो थोड़े दिन के बाद उत्तर प्रदेश से कांग्रेस की टिकट से समाजवादी पार्टी की मदद से राज्यसभा सांसद बन कर आ गए। उसके बाद चांदनी चौक को भूल गए। पूरी दिल्ली को भूल गए। दिल्ली में कोरोना वायरस की महामारी फैली है तो वे उसमें क्या कर रहे हैं, किसी को अंदाजा नहीं है? कोरोना के शुरुआती दिनों में जब प्रवासी मजदूर पलायन कर रहे थे और राहुल गांधी सड़क पर उतरे थे तब वे क्या कर रहे थे? सो, अगर कांग्रेस पार्टी ठीक से विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है तो उन्हें आगे बढ़ कर बताना चाहिए कि ऐसे विपक्ष की भूमिका निभाई जाती है!

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