अंत में येदियुरप्पा की ही चली

कर्नाटक में आखिरकार मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अपनी सरकार का विस्तार किया और अपनी शर्तों पर ही किया। साथ ही इस संभावना को भी खत्म करा दिया कि उनकी जगह नया मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। वे लगभग जबरदस्ती ही मुख्यमंत्री बने हुए हैं और 76 साल से ज्यादा उम्र होने और कई किस्म के आरोपों के बावजूद पार्टी उनको नहीं हटा पा रही है। उनकी असली ताकत लिंगायत वोट पर पकड़ है, जिसकी वजह से भाजपा को उनके सामने झुकना पड़ता है। इस बार भी उन्होंने भाजपा नेतृत्व के सामने अपनी शर्तें रखीं। उनकी शर्तों की वजह से भले मंत्रिमंडल का विस्तार कई महीने अटका रहा, लेकिन अंत में उन्होंने अपने हिसाब से मंत्रिमंडल का विस्तार किया।

तमाम दबाव के बावजूद येदियुरप्पा ने पार्टी के अंदर अपने विरोधियों को सरकार में नहीं लिया। पार्टी में उनका सबसे ज्यादा विरोध करने वाले बासवन्नागौड़ा पाटिल यतनाल मंत्री नहीं बन पाए। उन्होंने नाराजगी में येदियुरप्पा पर तमाम किस्म के आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि तीन लोग मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करके और पैसा देकर मंत्री बने हैं। उनको कहा कि सीडी कोटा और मनी कोटा से लोग मंत्री बन रहे हैं। उनके अलावा पार्टी के विधायक अरविंद बेलाड, सतीश रेड्डी, जी थिप्पा रेड्डी, एसए रामदास, एमपी रेणुकाचार्य आदि ने भी खूब विरोध किया है। पर येदियुरप्पा पर कोई असर नहीं है।

उन्होंने अपनी सरकार में न जातियों का संतुलन बनाया है और न क्षेत्र का। कर्नाटक के 14 जिलों का कोई मंत्री सरकार में नहीं है। 34 सदस्यों के मंत्रिमंडल में एक तिहाई मंत्री अकेले लिंगायत समुदाय के हैं। उसके बाद सात वोक्कालिगा और चार कुरुबा हैं। कर्नाटक की आबदी में इन जातियों की संख्या 37 फीसदी के करीब है पर मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी 70 फीसदी के करीब है। पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों को कीमत पर येदियुरप्पा ने अपने वोट बैंक से जुड़े लोगों को मंत्री बनाया है।

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