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राजरंग| नया इंडिया| Lachit Borphukan Birth Anniversary लचित बरफुकन भूला दिए गए नायक नहीं हैं

लचित बरफुकन भूला दिए गए नायक नहीं हैं

अहोम गणराज्य के महान सेनापति लचित बरफुकन इन दिनों चर्चा में हैं। उनकी चार सौवीं जयंती मनाई गई है और इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारत में इतिहास लिखने वालों को जम कर कोसा और कहा कि गलत और गुलामी का इतिहास लिखा गया है। दोनों ने कहा कि लचित बरफुकन जैसे महान योद्धा को भूला दिया गया। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। लचित भूला दिए गए नायक नहीं हैं। असम की लोक संस्कृति और लोक गीतों से लेकर मुख्यधारा की इतिहास की किताबों में उनको बड़े गर्व और आदर के साथ याद किया गया है। हर घटना को बड़ा इवेंट बनाने और विपक्षी पार्टियों को कोसने की परंपरा के तहत प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने चाहे जो कहा हो लेकिन हकीकत यह है कि चार सौ साल से लचित बरफुकन लोगों की स्मृति में बसे हुए हैं।

एक इतिहास की बात है कि 1930 से यानी कोई 92 साल से असम में हर साल 24 नवंबर को ‘लचित दिवस’ मनाया जाता है। सोचें, अंग्रेजों के जमाने से जिस नायक की स्मृति में एक दिन समर्पित हो उसे भूला दिया गया नायक कैसे कहा जा सकता है? असल में 1930 में ही अहोम विद्वान गोलप चंद्र बरूआ ने प्राचीन पोथियों का अंग्रेजी अनुवाद किया था और उसमें लचित बरफुकन की कहानी बहुत विस्तार से कही गई है। उसी साल से ‘लचित दिवस’ मनाया जाता है। अभी इतिहास की बात हो रही है तो यह तथ्य जानना जरूरी है कि देश जिस साल आजाद हुआ यानी 1947 में उसी साल असम सरकार के इतिहास एसके भूंइया ने ‘लचित बरफुकन एंड हिज टाइम्स’ नाम से उनके ऊपर किताब लिखी थी।

यह सही है कि असम के बाहर उनको कम लोग जानते हैं लेकिन यह बात तो हर प्रांत के ऐसे योद्धाओं के बारे में कही जा सकती है। तमिलनाडु से बाहर कितने लोग राजराजा चोल या राजेंद्र चोल के बारे में जानते हैं या महाराष्ट्र से बाहर कितने लोग पेशवा बाजीराव के बारे में जानते हैं या झारखंड के बाहर कितने लोग भगवान बिरसा मुंडा या सिद्धू कान्हो के बारे में जानते हैं? इतिहास पढ़ने वालों को थोड़ी बहुत जानकारी होगी लेकिन ये लोग अपने अपने राज्य में लोगों के मन मस्तिष्क में जिस तरह से स्थापित हैं वैसे दूसरे राज्यों में नहीं हैं। यहीं बात लचित बरफुकन के बारे में भी कही जा सकती है। यह भी कहना अतिश्योक्ति है या राजनीतिक रणनीति है कि लचित नहीं होते तो पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा नहीं होता। वह सांस्कृतिक रूप से पहले भी भारत का हिस्सा था और राजनीतिक रूप से अंग्रेजों की वजह से भारत का हिस्सा बना।

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