टिक टॉक का मुकदमा नहीं लड़ेंगे नेता वकील

केंद्र सरकार ने टिक टॉक सहित 59 चाइनीज एप्स पर पाबंदी लगाई। उसके बाद से पूरे देश में ऐसा यूफोरिया बना हुआ है, जैसे भारत ने अपने दुश्मन चीन की कमर तोड़ दी। हालांकि इसमें सचाई कतई नहीं है। गुरुवार को ही रिपोर्ट आई है कि टिक टॉक चलाने वाली कंपनी का कारोबार एक लाख 33 हजार करोड़ रुपए का है, जिसमें भारत का हिस्सा महज 43 करोड़ रुपए है। सोचें, एक लाख 33 हजार करोड़ में सिर्फ 43 करोड़! सो, आर्थिक रूप से इसका कोई मतलब नहीं है पर मनोवैज्ञानिक रूप से इसका कुछ महत्व हो सकता है। लेकिन इन चाइनीज एप्स पर पाबंदी को लेकर पैदा किया गया जुनून, उन्माद इतना बड़ा हो गया है कि नेता से वकील बने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बड़े बड़े वकील इसका केस नहीं ले रहे हैं।

वकील नेताओं और उनकी पार्टियों की ओर से गर्व के साथ बताया जा रहा है कि अमुक नेता ने केस ठुकराया। कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने केस ठुकरा दिया। उससे पहले खबर आई थी कि पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने टिक टॉक का केस सुनने से इनकार कर दिया था। कई और छोटे बड़े वकीलों ने इस बारे में सोशल मीडिया में पोस्ट डाली है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोई न कोई वकील मिल ही जाएगा, जब निर्भया के कातिलों को वकील मिल गए और चीन सहित दुनिया के तमाम दूसरे देशों की कंपनियों के लिए अब भी वकील पैरवी कर ही रहे हैं तो टिक टॉक के लिए भी मिल जाएंगे पर नेतानुमा वकील नहीं मिलेगा क्योंकि कोई भी पार्टी लोगों की नजर में चीन के नजदीक नहीं दिखना चाहती है। चाहे निर्भया के कातिलों के नजदीकी दिख जाएं, मॉब लिंचिंग करने वालों से नजदीकी दिख जाए, वोडाफोन, एपल से नजदीकी दिख जाए, चीन की दूसरी कम जानी-पहचानी कंपनियों से नजदीकी दिख जाए पर टिक टॉक से नजदीकी नहीं दिखनी चाहिए!

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