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वित्त मंत्री की बजाय प्रधानमंत्री को चिट्ठी

वस्तु व सेवा कर, जीएसटी कौंसिल की पिछली बैठक में राज्यों के बकाया मुआवजा के भुगतान को लेकर जो फॉर्मूला बना उसे लेकर राज्य नाराज हैं। बैठक के एक दिन बाद वित्त व व्यय सचिव की ओर से चिट्ठी लिखने के बावजूद राज्य सरकार के प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। पर हैरान करने वाली बात है कि वे अपने फैसले के बारे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बताने की बजाय सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख रहे हैं।

जीएसटी कौंसिल की बैठक में राज्यों को सुझाव दिया गया था कि केंद्र सरकार बकाया भुगतान करने में अभी सक्षम नहीं है लेकिन वह राज्यों को कर्ज दिला सकती है। कहा गया कि राज्य अभी कर्ज ले लें और बाद में जीएसटी की वसूली से उसको चुकाएं। राज्यों को एक हफ्ते में इस पर अपनी राय देनी थी। सबसे पहले जिन चार राज्यों ने इस पर अपनी राय भेजी, उनमें से तीन ने सीधे प्रधानंमत्री को चिट्ठी लिखी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वित्त मंत्री को चिट्ठी भेजी।

सोचें, तीन क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं ने वित्त मंत्री को बाईपास कर सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और दो टूक अंदाज में लिखा कि उनको केंद्र का प्रस्ताव मंजूर नहीं है। केजरीवाल ने प्रधानमंत्री से कहा कि केंद्र चाहे आरबीआई से ले या बाजार से ले, इससे राज्यों को मतलब नहीं है। केंद्र उनके बकाए का भुगतान करे और मुआवजा देने की सीमा 2022 से आगे भी बढ़ाए। बहरहाल, सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर राज्यों ने वित्त मंत्री के प्राधिकार को कम किया है। पर वैसे भी सभी राज्यों को पता है कि जो भी प्रस्ताव है वह पीछे से ही तैयार होकर आया होगा इसलिए भी उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है। बाकी राज्य जैसे केरल, पंजाब, राजस्थान, पुड्डुचेरी, पश्चिम बंगाल आदि भी सरकार के प्रस्ताव के विरोध में हैं।

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