लोकल लॉकडाउन का असर भी राष्ट्रीय होता है

कोरोना वायरस से लड़ाई में केंद्र और राज्यों की सरकारें सौ जूते और सौ प्याज खाने वाली स्थिति में है। लेकिन सरकारें नहीं चाहती हैं कि स्पष्ट रूप से ऐसा दिखे। इसलिए अब कंपलीट लॉकडाउन की जगह इलाकेवार यानी लोकल लॉकडाउन की रणनीति बनाई गई है। जैसे बिहार में पटना, भागलपुर, नावादा को लॉकडाउन किया गया और बाकी इलाकों में रात के कर्फ्यू की अवधि बढ़ा दी गई। महाराष्ट्र में पुणे, ठाणे, पिंपरी-चिंचवाड़ में दस दिन का लॉकडाउन किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने सप्ताहांत यानी शनिवार-रविवार का लॉकडाउन किया है। असम में गुवाहाटी बंद है तो कर्नाटक में रविवार को कलबुर्गी बंद किया गया। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने यहां लॉकडाउन बढ़ाया है।

सरकारें समझ रही हैं कि स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन का आर्थिकी पर वैसा असर नहीं होता है, जैसा कंपलीट लॉकडाउन का हुआ। पर यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। लॉकडाउन भले लोकल हो पर उसका असर राष्ट्रीय होता है। सबसे पहले तो इससे यह अंदेशा बना रहता है कि अभी कोरोना का संकट कायम है और उसकी वजह से मांग में बढ़ोतरी नहीं हो पाती है। दूसरे इलाकेवार बंदी होने से भी सप्लाई चेन प्रभावित होती है। कहीं पहुंच कर सामान से भरी गाड़ियां खड़ी हो जाती हैं तो कहीं गोदाम के सामने माल उठाने के गाड़ियां खड़ी रह जा रही हैं। अगर दो दिन भी गाड़ियां खड़ी रहीं तो बड़ा नुकसान होता है। इसी तरह एक शहर के दस दिन बंद रहना का असर उस शहर में सप्लाई होने वाले हर सामान पर पड़ता है। सो, लोगों के मनोविज्ञान से लेकर आर्थिकी तक लोकल लॉकडाउन का भी मोटे तौर पर वैसा ही असर होता है, जैसे राष्ट्रीय लॉकडाउन का होता है।

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