तीखी टिप्पणियों से क्या होता है? - Naya India
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तीखी टिप्पणियों से क्या होता है?

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि कोरोना वायरस का संक्रमण फैलाने के लिए चुनाव आयोग पर मुकदमा चलना चाहिए। अदालत ने यहां तक कहा कि आयोग के अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। सवाल है कि फिर अदालत ने मुकदमा चलाने की पहल क्यों नहीं की? जब हाई कोर्ट को लग रहा है, जैसा कि चीफ जस्टिस ने अपनी टिप्पणी में कहा कि चुनाव आयोग कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के लिए जिम्मेदार है और उसके अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए तो उसे मुकदमा दर्ज करने का आदेश भी देना चाहिए था। तभी नजीर कायम होती। चुनाव बीत जाने के बाद इस तरह की टिप्पणियों का कोई खास मतलब नहीं रह जाता है।

मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस इतने नाराज थे कि उन्होंने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए यहां तक कहा कि जब रैलियां हो रही थीं और कोरोना फैल रहा था तब क्या आयोग के अधिकार दूसरे ग्रह पर थे। यह बहुत तीखी टिप्पणी है लेकिन अगर यह बात आदेश में नहीं लिखी गई है तो उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि इस देश की सारी संस्थाओं के अधिकारियों की खाल मोटी हो गई है और वे अदालतों की ऐसी टिप्पणियों की परवाह नहीं करते हैं। जैसे दिल्ली में हाई कोर्ट ने ऑक्सीजन को लेकर कितनी खरी-खोटी सुनाई लेकिन उससे क्या हुआ? चार दिन तक की फटकार के बावजूद दिल्ली में ऑक्सीजन की स्थिति नहीं सुधरी। सो, अदालतों को सुनवाई के दौरान टिप्पणी करने की बजाय आदेश देना चाहिए। अदालतों में सुनवाई के दौरान जज जो टिप्पणी करते हैं उसे आदेश में लिखें, तभी उसका कुछ असर हो सकता है, वरना कितनी भी तीखी टिप्पणी हो, उससे कुछ नहीं होगा।

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