महाराष्ट्र के राज्यपाल कब देंगे मंजूरी?

Must Read

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में 16 मार्च को कैबिनेट की बैठक हुई और सरकार ने 12 सदस्यों के नाम उच्च सदन यानी विधान परिषद में मनोनीत करने के लिए भेजा। राज्यपाल फागू चौहान ने 17 मार्च को उसे मंजूरी दी और उसी दिन उसकी गजट अधिसूचना जारी हो गई। 17 मार्च को ही मनोनीत सदस्यों में से कुछ लोगों ने विधान परिषद की सदस्यता भी ग्रहण कर ली। यानी कुल 24 घंटे के अंदर कैबिनेट की सिफारिश, राज्यपाल द्वारा मंजूरी और सदस्यों की शपथ भी हो गई। सरकार ने जो 12 नाम भेजे, वे सभी जनता दल यू और भाजपा के नेताओं के हैं। उनमें से कोई भी राजनीति के अलावा कोई खास योग्यता नहीं रखता है। दो लोग तो राज्य सरकार में पहले से मंत्री हैं, जिनको राज्यपाल के कोटे से मनोनीत किया गया है।

अब इसके बरक्स महाराष्ट्र सरकार की ओर से विधान परिषद में मनोनयन के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को भेजी गई सिफारिश को देखें। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक ने 30 अक्टूबर 2020 को 12 नामों की मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने सात नवंबर 2020 को इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेज दिया। उसके बाद चार महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी राज्यपाल ने अभी इन नामों को मंजूरी नहीं दी है। राज्य सरकार की ओर से भेजे गए नामों को न तो मंजूर किया गया और न खारिज किया गया है। प्रस्ताव राज्यपाल के पास लंबित है।

राज्यपाल चाहें तो इस आधार पर सिफारिश लौटा सकते हैं कि जो नाम भेजे गए हैं वे मनोनयन के लिए तय की गई अर्हता को पूरा नहीं करते हैं। इस आधार पर भाजपा के नेता और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने उस समय की अखिलेश यादव सरकार की सिफारिश लौटाई थी। उन्होंने कहा था कि राज्यपाल कोटे से उन्हीं लोगों को मनोनीत किया जा सकता है, जिनका सामाजिक कार्य, साहित्य, कला आदि के क्षेत्र में योगदान हो। यह अलग बात है कि भाजपा खुद अपने नेताओं को ही मनोनीत करती रही है। बिहार में भी मनोनीत सभी लोग नेता ही हैं।

बिहार में 24 घंटे में मंजूरी और महाराष्ट्र में चार महीने से राज्य सरकार की सिफारिश को रोके रखना, इस बात का संकेत है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व किसी तरह से राज्यपाल के जरिए राज्य सरकार को उसकी हैसियत दिखाना चाह रहा है। पिछले साल मार्च में भी इसी तरह राज्यपाल ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के विधान परिषद के लिए होने वाले चुनाव को लटका कर रखा था। बाद में मुख्यमंत्री ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी और 48 घंटे के अंदर राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग तक सबने उनके चुनाव का रास्ता साफ कर दिया था। तो क्या उसी तरह से उद्धव ठाकरे को फिर अपनी सरकार की ओर से भेजी गई सूची को मंजूरी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से बात करनी होगी?

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

साभार - ऐसे भी जानें सत्य

Latest News

कैसा होगा ‘मोदी मंत्रिमंडल’ का फेरबदल?

बीजेपी हर हालत में उत्तर प्रदेश का चुनाव दोबारा जीतना चाहेगी। लिहाज़ा उत्तर प्रदेश से कुछ चेहरों को ख़ास...

More Articles Like This