राजनीति

महा विकास अघाड़ी का मामला सुलझा

शरद पवार की क्या राजनीति है, इस पर कांग्रेस में इन दिनों बहुत मंथन चल रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रचार में नहीं जा रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया है। वे परदे के पीछे अभी सक्रिय हैं। इस समय उनकी सबसे बड़ी चिंता शरद पवार की राजनीति है। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों जब पवार की बेटी सुप्रिया सुले उनसे मिलने गई थीं तब उन्होंने इस बारे में बात की थी। सोनिया ने उनसे दो टूक पूछा था कि उनके पिता शरद पवार की क्या राजनीति है? बताया जा रहा है कि सोनिया ने खास तौर से यह पूछा था कि क्या शरद पवार भाजपा के साथ जाने पर भी विचार कर रहे हैं? वे यह भी जानना चाहती थीं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए को लेकर उनकी क्या सोच है?

जानकार सूत्रों के मुताबिक सुप्रिया ने सोनिया को भरोसा दिलाया कि शरद पवार का यूपीए से अलग होने का कोई इरादा नहीं है। इसके आगे कांग्रेस नेता चुप्पी साध लेते हैं पर एक हफ्ते पहले ही कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पत्रकारों से औपचारिक बातचीत में यह संकेत दे दिया था कि मामला जल्दी ही सुलझ जाएगा क्योंकि शिव सेना और एनसीपी के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। दोनों के पास एक ही विकल्प है कि वे भाजपा के साथ जाएं लेकिन दोनों को पता है कि वहां से मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के पास रहेगी और दोनों सहयोगी पार्टी को कुछ हाथ नहीं आएगा। कांग्रेस के साथ तालमेल में दोनों पार्टियों को पूरी छूट मिली हुई है।

तभी कांग्रेस नेताओं ने तेवर तीखे किए। नाना पटोले ने कहा कि कांग्रेस अपने समर्थन पर फिर से विचार करेगी। इसके बाद प्रदेश के एक नेता ने यह संकेत दिया कि पार्टी साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर फिर से विचार करने और उसे रिवाइज करने की मांग  करेगी। कांग्रेस की ओर से दबाव बढ़ाने का नतीजा यह हुआ कि शिव सेना को सफाई देनी पड़ी। पार्टी के बड़बोले सांसद संजय राउत ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि यूपीए का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ से ले लिया जाए और शरद पवार को दे दिया जाए। हालांकि पहले वे कई बार यह बात कह चुके हैं। फिर भी कांग्रेस ने उनकी सफाई कबूल कर ली है।

सो, कांग्रेस के जानकार नेताओं का कहना है कि महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार के अंदर उठा विवाद सुलझ गया है। यह भी कहा जा रहा है कि शरद पवार एक बार फिर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को गच्चा देने में कामयाब हो गए हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह पहले एक बार उनसे धोखा खा चुके हैं। इसलिए इस बार अगर कोई बात हुई थी वह ठोस होगी। भाजपा के नेताओं का कहना है कि इस बारे में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेग।

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