एमएलसी का नामांकन रूकवाने का क्या मकसद? - Naya India
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एमएलसी का नामांकन रूकवाने का क्या मकसद?

महाराष्ट्र में विधान परिषद के 12 सदस्यों का मनोनयन भारतीय जनता पार्टी ने रूकवाया हुआ है। राज्य सरकार की ओर से कैबिनेट की बैठक में 12 नाम तय करके राज्यपाल को भेज दिए जाने के छह महीने बाद भी राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी इस बारे में फैसला नहीं कर रहे हैं। राज्य सरकार ने पिछले साल पांच नवंबर को 12 नाम राज्यपाल को भेजे थे, जिसमें राज्य की महाविकास अघाड़ी सरकार में शामिल तीन पार्टियों- शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की ओर से दिए गए चार-चार लोगों के नाम हैं। इसमें कुछ नेता भी हैं और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े लोग और फिल्म व साहित्य की हस्तियां भी हैं। पहले कहा जा रहा था कि इस आधार पर सूची को चुनौती दी जा सकती है कि इसमें राजनेताओं के नाम हैं, जबकि मनोनीत श्रेणी उनके लिए नहीं है। पर भाजपा इस आधार पर चुनौती नहीं दे सकती है क्योंकि दो महीने पहले ही उसने बिहार में मनोनीत श्रेणी की सभी सीटों पर सिर्फ नेताओं को ही नियुक्त किया है।

तभी भाजपा के नेता और पिछली सरकार के मंत्री रहे आशीष सेलार ने कहा है कि राज्यपाल के ऊपर फैसला करने के लिए समय की कोई बाध्यता नहीं है। यानी संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि राज्यपाल कितने समय के अंदर सरकार की सिफारिशों को स्वीकार करेंगे। यह कुतर्क है कि संविधान में समय सीमा तय नहीं की गई है तो राज्यपाल अनंत काल तक सरकार की सिफारिश को स्वीकार नहीं करेंगे। असल में भाजपा किसी और रणनीति के तहत मनोनयन रूकवा रही है।

भाजपा के जानकार नेताओं का कहना है कि पार्टी जिस तरह से पश्चिम बंगाल की हार को नहीं पचा पा रही है वैसे ही उसे यह बात भी हजम नहीं हो रही है कि महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद वह विपक्ष में है। इसके अलावा भाजपा इस उम्मीद में है कि महाविकास अघाड़ी सरकार गिर सकती है या गिराई जा सकती है और तब भाजपा की सरकार बनेगी। इस इंतजार में भाजपा ने मनोनीत श्रेणी की सीटों पर नियुक्ति का मामला रूकवा रखा है ताकि अगर अगले कुछ दिन में भाजपा किसी तरह से सरकार बना लेती है तो वह अपने 12 लोगों को मनोनीत करेगी। यह भी कहा जा रहा है कि मनोनीत श्रेणी की सीटें भी शिव सेना या एनसीपी के साथ मोलभाव का एक हथियार हो सकती हैं। हालांकि अब हाई कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी किया है। सो, देखना दिलचस्प होगा कि छह महीने से सरकार की सिफारिश लटकाए रखने का अदालत में क्या रोचक तर्क दिया जाता है।

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