महाराष्ट्र में शिव सेना की अनोखी राजनीति

महाराष्ट्र में शिव सेना ने चुनाव बाद गठबंधन बदल कर सरकार बनाने का अभूतपूर्व प्रयोग किया था उसके बाद से ही पार्टी अनोखी राजनीति कर रही है। पार्टी के शीर्ष नेता प्रदेश भाजपा के खिलाफ तो मोर्चा खोले हुए हैं पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के प्रति पूरा सद्भाव दिखाया जा रहा है। इससे सत्तारूढ़ महाविकास अघाड़ी के नेता भी कंफ्यूजन में हैं। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी इस कंफ्यूजन को बढ़ाया है। वे 22 मई को सोनिया गांधी की बुलाई विपक्ष की बैठक में शामिल हुए। कांग्रेस और गांधी परिवार के साथ शिव सेना के रिश्तों को देखते हुए माना जा रहा था कि वे किसी न किसी बहाने इस बैठक से दूरी बना लेंगे, जैसे अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव या मायावती जैसे विपक्षी नेताओं ने बनाया। पर वे बैठक में शामिल हुए।

इसके अगले दिन उनकी पार्टी के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद संजय राऊत ने महाराष्ट्र राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की जम कर तारीफ की। उनको उद्धव ठाकरे के पितातुल्य बताया और कहा कि दोनों के बीच पिता-पुत्र जैसा रिश्ता है। सोचें, जब कोश्यारी ने विधान परिषद में उद्धव ठाकरे के मनोनयन की राज्य कैबिनेट की सिफारिश को नहीं माना था तब शिव सेना के नेताओं ने उनके लिए क्या क्या कहा था। पर अब वे पितातुल्य हो गए क्योंकि दिल्ली दरबार के कहने पर उन्होंने आनन-फानन में विधान परिषद का चुनाव करवा दिया, जिससे उद्धव की कुर्सी बच गई।

जिस दिन उद्धव ठाकरे विधान परिषद के लिए चुने गए उसके अगले दिन शिव सेना के मुखपत्र सामना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तारीफ की गई और दोनों को धन्यवाद दिया गया। एक तरफ शिव सेना प्रदेश भाजपा नेताओं पर हमले कर रही है औऱ दूसरी ओर केंद्रीय नेतृत्व से सद्भाव बनाया हुआ है। इस तरह शिव सेना ने प्रदेश भाजपा नेताओं को उनकी हैसियत बताई हुई है और अपने सहयोगियों को भी मैसेज दिया हुआ है कि वे सिर्फ कांग्रेस और एनसीपी के भरोसे ही नहीं हैं।

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