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अखिलेश के नेतृत्व की परीक्षा है

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए मैनपुरी का लोकसभा चुनाव करो या मरो की तरह है। यह उनके नेतृत्व की परीक्षा है। लोकसभा की अपनी जीती हुई आजमगढ़ सीट उपचुनाव में गंवाने के बाद अब उनके सामने इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि उनकी पार्टी मैनपुरी सीट जीते। ध्यान रहे सपा ने सबसे मुश्किल समय में भी आजमगढ़ और मैनपुरी की सीट जीती थी। पहली बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हो रहे 2014 के चुनाव में भी सपा दोनों सीटों पर जीती थी और 2019 में भी पार्टी दोनों सीटों पर जीती। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने के बाद जब अखिलेश यादव ने सांसद की बजाय विधायक रहने का फैसला किया तो उन्होंने आजमगढ़ सीट छोड़ी और उपचुनाव में पार्टी वह सीट हार गई। इतना ही नहीं पार्टी रामपुर की सीट भी हार गई, जहां के सांसद आजम खान ने इस्तीफा दिया था।

अब आजम खान की विधानसभा सीट और मुलायम सिंह यादव के निधन से खाली हुई मैनपुरी सीट पर चुनाव हो रहा है। ये दोनों चुनाव अखिलेश यादव का नेतृत्व की परीक्षा हैं। अखिलेश ने कोई जोखिम नहीं लेते हुए अपनी पत्नी डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी के स्टार प्रचारकों की जो सूची बनी है उसमें चाचा शिवपाल यादव को भी रखा गया है। हालांकि भाजपा ने शिवपाल यादव के करीबी रहे रघुराज सिंह शाक्य को उम्मीदवार बना दिया है। ध्यान रहे आजमगढ़ सीट पर अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव हारे थे। इसलिए भी मैनपुरी में डिंपल की जीत सुनिश्चित करना अखिलेश के लिए बेहद जरूरी है। विधानसभा चुनाव के बाद उपचुनावों में हार का जो सिलसिला शुरू हुआ है उसे तोड़ने के लिए भी यह चुनाव जरूरी है।

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