मणिपुर भी क्या संविधान से ही चलता है?

पूर्वोत्तर के राज्यों में होने वाले राजनीतिक तमाशे पर आमतौर पर देश के दूसरे हिस्सों की नजर कम ही जाती है। पर मणिपुर में चल रहा राजनीतिक तमाशा सारी हदें पार कर रहा है। ऐसा लग रहा है कि मणिपुर में कोई राजनीतिक या संवैधानिक व्यवस्था काम नहीं करती है। ताजा मामला राज्य सरकार के बहुमत साबित करने का है। विधानसभा सत्र की घोषणा के बाद कोई 15 दिन पहले मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया था, जिसे स्पीकर ने नहीं स्वीकार किया और मुख्यमंत्री को विश्वास प्रस्ताव लाने की मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव ले आए तो स्पीकर ने उस पर बहस के बाद वोटिंग कराने की बजाय ध्वनि मत से विश्वास प्रस्ताव को मंजूर कर लिया।

इससे पहले पिछले महीने राज्यसभा चुनाव के समय स्पीकर ने मनमाने तरीके से कांग्रेस पार्टी का समर्थन करने वाले तीन विधायकों को वोटिंग करने से रोक दिया, जिसकी वजह से भाजपा को अपना उम्मीदवार जिताने में आसानी हो गई। तीन साल पहले विधानसभा चुनाव के बाद से ही जिस राजनीतिक तमाशे की शुरुआत हुई थी वह अभी तक चल रहा है और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद भी वहां वहीं हो रहा है, जो स्पीकर और सरकार चाहते हैं। दलबदल कानून में यह साफ लिखा हुआ है कि किसी भी पार्टी का विलय तभी मंजूर होगा, जब कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद पार्टी से अलग हों। पर मणिपुर में कांग्रेस के 28 में से सात विधायक यानी एक चौथाई विधायक अलग होकर भाजपा के साथ चले गए और अभी तक स्पीकर ने उनके बारे में कोई फैसला नहीं किया। उनके समर्थन से भाजपा की सरकार चल रही है। उनमें से कुछ लोग वापस आकर राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करना चाहते तो स्पीकर ने उसकी भी मंजूरी नहीं दी।

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