माया, ममता व अखिलेश अलग-थलग

एक समय था, जब दिल्ली की राजनीति की कल्पना समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बगैर नहीं की जा सकती थी। नब्बे के दशक की शुरुआत से लेकर हाल के दिन तक यह स्थिति रही थी। पर अब दिल्ली की राजनीति में उत्तर प्रदेश की दोनों प्रादेशिक पार्टियों को कोई पूछने वाला नहीं है। जाने या अनजाने में दोनों पार्टियों ने अपने को विपक्ष की राजनीति से भी अलग किया हुआ है। संख्या के लिहाज से तो दोनों पार्टियां कमजोर हैं, पर इन दोनों से ज्यादा खराब स्थिति कम्युनिस्ट पार्टियों की भी है फिर भी उन्होंने अपने को दिल्ली में प्रासंगिक बना रखा है। शरद पवार की पार्टी के पास भी सिर्फ पांच सांसद हैं और इतने पर भी एनसीपी दिल्ली में प्रासंगिक है। लेकिन सपा और बसपा बिल्कुल अप्रसांगिक दिख रहे हैं।

यहीं स्थिति ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की है। उसके 23 सांसद हैं पर उन्होंने अपने को विपक्ष की राजनीति से बिल्कुल अलग रखा है। अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और तृणमूल कांग्रेस को पता है कि उसकी सीधी लड़ाई भाजपा से होनी है। इसलिए भाजपा के साथ लड़ते हुए भी तृणमूल ने अपने को विपक्ष से दूर रखा है। असल में तृणमूल का मकसद यह दिखाना है कि वह भाजपा से अकेले लड़ रही है। इसका मकसद भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करके अपने खाते में रोके रखना है। उन्हें पता है कि कांग्रेस और लेफ्ट मिल कर चुनाव लड़ेंगे इसलिए दोनों से दूरी बनाना उनकी मजबूरी है। तभी ममता बनर्जी ने दिल्ली के दंगों को लेकर लगातार अपनी ओर से बयान दिया। विपक्ष के साथ साझेदारी का कोई प्रयास उन्होंने नहीं किया। इस तरह विपक्ष और खास कर कांग्रेस व लेफ्ट से दूरी दिखाने की ममता की रणनीति तो समझ में आती है पर सपा और बसपा की राजनीति समझ में नहीं आ रही है। ऐसा भी नहीं है कि दोनों के पास नेता नहीं हैं। पहले जो नेता दिल्ली में दोनों पार्टियों का काम संभालते थे, अब भी वे ही नेता हैं। बसपा का कामकाज सतीश चंद्र मिश्र देख रहे हैं और सपा का रामगोपाल यादव संभाल रहे हैं। इसके बावजूद दोनों पार्टियां विपक्ष की राजनीति से दूर हैं। ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा की कमान में चल रहे कांग्रेस के राजनीतिक प्रयास ने दोनों पार्टियों को कांग्रेस से दूर किया है। तभी चाहे दिल्ली के दंगे पर कांग्रेस का राष्ट्रपति भवन तक मार्च हो या संसद के बजट सत्र की रणनीति हो, दोनों पार्टियां किसी मामले में शामिल नहीं हुई हैं। कांग्रेस भी उन्हें पूछ नहीं रही है।

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