mayawati prabudh sammelan brahman ब्राह्मण को रिझाने में मायावती
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ब्राह्मण को रिझाने में मायावती

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अभी कुछ दिन पहले तक लग रहा था कि बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति से बाहर है। हाल में मीडिया समूहों की ओर से कराए गए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी दिखा की बसपा बिल्कुल हाशिए की पार्टी हो गई है। लेकिन पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की ओर से शुरू किया गया ब्राह्मण सम्मेलन रंग लाने लगा है। पार्टी ने सतीश चंद्र मिश्रा को आगे कर प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन शुरू कराया और वह भी अयोध्या से। इसका समापन सात सितंबर को लखनऊ में हुआ, जिसमें मायावती भी शामिल हुईं। प्रबुद्ध वर्ग के नाम से हो रहे ब्राह्मण सम्मेलन में मायावती ने गजब किया। उन्होंने खुल कर ब्राह्मणों को केंद्र में रख कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। मंच पर मायावती ने त्रिशूल लहराया। ध्यान रहे जय श्रीराम के नारे की तरह त्रिशूल भी हिंदू राजनीति का प्रतीक है, जिसका इस्तेमाल अभी तक सिर्फ शिव सेना करती रही थी। (mayawati prabudh sammelan brahman)

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मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति की वह नस पकड़ी है, जिसे पकड़ने में अभी तक समाजवादी पार्टी कामयाब नहीं हो सकी है। इसका कारण यह है कि सपा के साथ पहले भी कभी ब्राह्मणों का लगाव नहीं रहा है। सवर्ण जातियों में ठाकुर जरूर सपा के साथ रहे पर जनेश्वर मिश्रा के जमाने में ब्राह्मण सपा के साथ नहीं रहे थे। इसके उलट बसपा के साथ उनका अनुभव अच्छा रहा है। मायावती 2007 में ब्राह्मण के समर्थन से पूर्ण बहुमत हासिल करने में कामयाब रही थीं और उन्होंने ब्राह्मणों को अच्छा खासा महत्व दिया था।

इस बार फिर वे वहीं राजनीति कर रही है। हालांकि जानकार मान रहे हैं कि काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती। लेकिन ब्राह्मण वोट की राजनीति कोई काठ की हांडी नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस तरह 2007 में ब्राह्मण का भाजपा से मोहभंग हुआ था और वे एकमुश्त बसपा के साथ गए थे वैसी स्थितियां उत्तर प्रदेश में हैं। ब्राह्मण का योगी आदित्यनाथ के राज से मोहभंग हुआ है, कांग्रेस लड़ाई में नहीं है और सपा कभी उनकी पसंद की पार्टी नहीं रही है। ऐसे में उनके सामने बसपा का एक मजबूत विकल्प है। मायावती के पास अब भी बहुसंख्यक दलित वोट है। अगर ब्राह्मण उनके साथ गए तो उत्तर प्रदेश की चुनावी तस्वीर बहुत बदली हुई होगी। मुस्लिम अंत तक इंतजार करेंगे।

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