राजनीति

महबूबा को आजम खान बनाने का प्रयास

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को अभी मुश्किलों से मुक्ति नहीं मिलने वाली है। भाजपा ने उनको प्रतीक बना कर जम्मू कश्मीर में सौ फीसदी ध्रुवीकरण की ठान ली है, जैसे उत्तर प्रदेश में किया गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सत्ता में आते ही आजम खान को प्रतीक के तौर पर चुना और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की। उनके ऊपर सैकड़ों मुकदमे दर्ज कराए गए। उन्हें, उनकी पत्नी और बेटे को जेल में बंद किया गया। पुलिस के साथ साथ केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। किताब से लेकर बकरी चोरी तक के मुकदमे किए गए। बेटे की विधायकी खत्म कराई गई। इस आधार पर भाजपा समझ रही है कि उसने अगले चुनाव के लिए ध्रुवीकरण का माहौल बना दिया है।

यहीं कहानी जम्मू कश्मीर में दोहराई जा रही है। वहां भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के परिवार को चुना है। उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की जांच शुरू हो गई है। ईडी ने पिछले दिनों उनको बुला कर लंबी पूछताछ की। उसके बाद खबर आई कि उनका पासपोर्ट बनाने से इनकार कर दिया गया क्योंकि सीआईडी की रिपोर्ट ठीक नहीं थी। सोचें, एक राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व सांसद के बारे में सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। तीन साल पहले तक वे एक राज्य की मुख्यमंत्री थीं और वह भी भाजपा के समर्थन से बनी थीं, लेकिन अब देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

इतना ही नहीं सीआईडी ने उनकी मां गुलशान नाजिर के बारे में भी निगेटिव रिपोर्ट दी। इस वजह से उनका पासपोर्ट भी नहीं बना। सोचें, उनके पति मुफ्ती मोहम्मद सईद देश के गृह मंत्री रहे हैं और राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी बेटी राज्य की मुख्यमंत्री थीं और सीआईडी के हिसाब से उनका पासपोर्ट नहीं बनना चाहिए। जाहिर है यह सारा मामला राजनीतिक है और जब तक जम्मू कश्मीर में विधानसभा के चुनाव नहीं हो जाते हैं तब तक मुफ्ती परिवार की मुश्किलें नहीं खत्म होने वाली हैं।

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पत्रकारों को राहुल की चिंता
जब से राहुल गांधी ने अंग्रेजी और टेलीविजन वाले कथित बड़े पत्रकारों को ट्विटर पर अनफॉलो किया तब से पत्रकारों को उनकी…

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पत्रकारों को राहुल की चिंता

जब से राहुल गांधी ने अंग्रेजी और टेलीविजन वाले कथित बड़े पत्रकारों को ट्विटर पर अनफॉलो किया तब से पत्रकारों को उनकी चिंता सताने लगी है। वे उनको अजीबोगरीब राय दे रहे हैं। जैसे राजदीप सरदेसाई ने लेख लिख कर कहा कि राहुल गांधी को कांग्रेस से निकल कर अलग पार्टी बनानी चाहिए। सोचें, राहुल के पास देश की सबसे पुरानी और एक विशाल पार्टी है, जिसे वे ठीक से नहीं चला पा रहे हैं और राजदीप ने उनको सलाह दे दी कि वे नई पार्टी बना लें! असल में उनको लग रहा है कि कांग्रेस के पुराने नेता राहुल को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं। लेकिन सवाल है कि राहुल ने जिन नेताओं को चुना और केंद्र में मंत्री बनाया या प्रदेशों में अध्यक्ष बनाया वे कौन सा राहुल को मजबूत बना रहे हैं? उन्होंने ही तो सबसे ज्यादा राहुल को कमजोर किया है!

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बहरहाल, राजदीप ने एक सलाह दी एक दूसरे पत्रकार ने सलाह दी कि कांग्रेस पार्टी खुद ही क्यों नहीं सोनिया, राहुल और प्रियंका को अलग करके नई पार्टी बन जाती है? यानी गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस पार्टी! फिर एक महिला पत्रकार ने ऐलान किया कि अगर देश का मीडिया नरेंद्र मोदी से कठिन सवाल नहीं पूछ सकता है तो उसे विपक्ष यानी राहुल गांधी से भी सवाल भी पूछने का हक नहीं है। असल में मुख्यधारा की मीडिया से बाहर के पत्रकारों की एक बड़ी जमात को इस बात पर आपत्ति है कि मुख्यधारा की मीडिया क्यों विपक्ष से सवाल पूछ रही है। सो, इस समय सोशल मीडिया में कुल मिला कर हालात ऐसे हैं कि पत्रकारों की बड़ी मंडली राहुल गांधी की चिंता में है। वैसे तो पिछले काफी समय से पत्रकारों द्वारा राहुल गांधी और कांग्रेस को नसीहत देने का काम चल रहा है पर अब जबसे ऐसा लगने लगा है कि भाजपा बैकफुट पर है और नरेंद्र मोदी से भी लोग नाराज हो सकते हैं, तब से राहुल को सलाह देने वाले और उनकी चिंता करने वाले बढ़ गए हैं।

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