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मोदी और शी मिलेंगे ऑनलाइन!

भारत और चीन के रक्षा मंत्रियों और विदेश मंत्रियों के बाद अब शीर्ष नेताओं की मुलाकात की बारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग से मिलने वाले हैं। इस महीने तीन बहुपक्षीय सम्मेलन हो रहे हैं। पहले 10 नवंबर को शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक है। उसके बाद 17 नवंबर को ब्रिक्स देशों यानी ब्राजील, रूस, भारत और चीन की बैठक होने वाली है। इसके बाद 21 और 22 नवंबर को दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह यानी जी-20 की बैठक होने वाली है।

ये तीनों बहुपक्षीय बैठकें बेहद अहम है और भारत व चीन तीनों के सदस्य हैं। ये तीनों बैठकें ऑनलाइन होने वाली हैं। कोरोना वायरस की महामारी शुरू होने और अप्रैल के अंत में लद्दाख में चीन की घुसपैठ की कोशिशों से शुरू हुए गतिरोध के बाद मोदी और शी पहली बार आमने-सामने होंगे। पहले दोनों में बहुत अच्छे संबंध रहे हैं और बतौर मुख्यमंत्री मोद ने सबसे ज्यादा चीन की यात्रा की है। प्रधानमंत्री के रूप में भी दोनों के बीच दो बार अनौपचारिक और कई बार औपचारिक वार्ताएं हो चुकी हैं। बहुपक्षीय मंचों पर तो दोनों की अनगिनत मुलाकातें हैं।

तभी सवाल है कि अब अगर फिर दोनों की मुलाकात होने वाली है और वह भी बहुपक्षीय मंच पर ऑनलाइन तो इसमें इतनी चर्चा की क्या बात है? चर्चा की बात इसलिए है क्योंकि अगर  प्रधानमंत्री मोदी किसी बहुपक्षीय सम्मेलन में शामिल होते हैं, जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग भी मौजूद हों और वहां लद्दाख में चल रहे गतिरोध का मुद्दा न उठे या चीन की विस्तारवादी नीतियों पर बात न हो पूरे मामले में भारत की स्थिति कमजोर होगी।

यह सही है कि दोनों नेताओं की दोपक्षीय वार्ता नही होनी है और बहुपक्षीय मंच होने की वजह से दोनों के बीच अभिवादन से ज्यादा कुछ नहीं होगा। लेकिन प्रधानमंत्री अगर अपने भाषण में चीन का मुद्दा नहीं उठाते हैं। चीन की विस्तारवादी नीतियों और भारत के प्रति उसकी आक्रामकता को लेकर कोई प्रस्ताव नहीं आता है या कोरोना वायरस के प्रसार में उसकी भूमिका के लिए उसको जिम्मेदार ठहराने वाली बात नहीं होती है तो उससे चीन को ताकत मिलेगी।

तभी भाजपा के सांसद और चीन के मामलों के जानकार सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मोदी से आग्रह किया है कि वे एससीओ, ब्रिक्स और जी-20 की बैठकों में हिस्सा न लें। स्वामी ने कहा है कि मोदी का चाहिए कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए कहें। बहराहल, अगर प्रधानमंत्री इन तीन बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उम्मीद करनी चाहिए कि वे भारत के हितों को आगे रखते हुए चीन को कठघरे में खड़ा करेंगे और बाकी सदस्यों देशों के साथ मिल कर चीन को अलग-थलग करने का प्रयास करेंगे। अगर वे ऐसा करने की तैयारी कर रहे हैं तो निश्चित रूप से उनको इन सम्मेलनों में हिस्सा लेना चाहिए।

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