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पालकी ढोने के लिए बिहार, झारखंड के भाजपा नेता

Karnataka dispute BJP

भाजपा के शीर्ष 15 नेताओं में बिहार के किसी नेता की कोई जगह नहीं है। भाजपा ने 11 सदस्यों के संसदीय बोर्ड का गठन किया और 15 सदस्यों की केंद्रीय चुनाव समिति बनाई। इसमें 11 सदस्य कॉमन हैं। सो, कुल 15 नेताओं का एक समूह है, जो सर्वोच्च है और दो कमेटियों का सदस्य है। इसमें बिहार और झारखंड के किसी नेता के लिए जगह नहीं है। इतना ही नहीं भाजपा के नौ राष्ट्रीय महामंत्रियों में भी बिहार और भाजपा के किसी नेता को जगह नहीं मिली है। एक दर्जन उपाध्यक्षों में जरूर बिहार से एक राधामोहन सिंह को और झारखंड से रघुवर दास को जगह मिली है, लेकिन सबको पता है कि उपाध्यक्ष का कोई मतलब नहीं होता है। पार्टी में सबसे अहम संसदीय बोर्ड है, फिर केंद्रीय समिति है और पार्टी के महासचिव हैं। इनमें कहीं भी बिहार या झारखंड का नेता नहीं है।

सोचें, बिहार और झारखंड में लोकसभा की 54 सीटें हैं। इन 54 सीटों में से पिछले चुनाव में एनडीए को 51 सीटें मिली थीं। नीतीश कुमार के अलग होने के बाद भी इन दो राज्यों में एनडीए के पास 35 सीटें हैं और अकेले भाजपा के पास 29 सीटें हैं। इसके बावजूद इन दोनों राज्यों में से किसी नेता को इस लायक नहीं माना गया कि उन्हें संसदीय बोर्ड या केंद्रीय चुनाव समिति में जगह मिले या पार्टी का महामंत्री बनाया जाए। प्रधानमंत्री बिहार जाएंगे तो यह जरूर कहेंगे कि बिहार के लोग इतने टैलेंटेड हैं कि किसी भी आईआईटी, आईआईएम में जाएं या प्रशासनिक अधिकारियों को देखें तो बिहार के लोग मिल जाएंगे। सवाल है कि जब इतने टैलेंटेड लोग बिहार के हैं तो मोदी और अमित शाह को बिहार भाजपा के नेताओं में कोई टैलेंट क्यों नहीं दिखता है? मोदी की सरकार में भी शीर्ष पांच मंत्रियों या शीर्ष 10 मंत्रालयों में बिहार के किसी नेता को जगह नहीं है और न पार्टी संगठन में कहीं बिहार-झारखंड के नेताओं की जगह है।

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