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जदयू की दबाव की राजनीति

केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलों के साथ ही भाजपा की सहयोगी पार्टियों ने दबाव की राजनीति शुरू कर दी है। अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल और जननायक जनता पार्टी के दुष्यंत चौटाला ने अमित शाह से मुलाकात की। भाजपा की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी सहयोगी जनता दल यू ने भी दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में पार्टी के नेता आरसीपी सिंह ने मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि सरकार का विस्तार होने वाला है और सभी सहयोगियों को सम्मानजनक तरीके से भागीदारी मिलनी चाहिए।

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ध्यान रहे दो साल पहले भी जनता दल यू इसी सम्मानजनक भागीदारी की मांग की वजह से सरकार से बाहर रह गई थी। उस समय हालांकि आरसीपी सिंह को प्रधानमंत्री के यहां से फोन आ गया था और वे मंत्री बनने की तैयारी में थे पर दूसरे नेताओं ने सम्मानजनक भागीदारी का मसला उठाया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि सिर्फ एक मंत्री बनाना उनको कबूल नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें प्रतीकात्मक भागीदारी नहीं चाहिए, बल्कि सांसदों की संख्या के अनुपात में उनकी पार्टी से मंत्री बनाया जाना चाहिए। उनकी इस मांग की वजह से आरसीपी सिंह केंद्रीय मंत्री बनते बनते रह गए।

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इस बार कहा जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह मंत्री बन सकते हैं, इसलिए आरसीपी सिंह ने सम्मानजनक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बनाया है। सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मांगने से पहले जदयू के नेताओं ने अलग तरह से दबाव बनाना शुरू कर दिया था। पार्टी की ओर से अचानक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग शुरू हो गई। पार्टी के कई नेताओं ने इसकी मांग की और जदयू की सहयोगी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी ने तो यहां तक कहा कि डबल इंजन की सरकार होने पर भी अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला तो फिर कभी नहीं मिलेगा।

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असल में बिहार में इस समय उठापटक की जो राजनीति चल रही, मांझी और मुकेश साहनी की मुलाकातें हो रही हैं और मांझी और ने लालू प्रसाद के बेटे तेज प्रताप से भी मुलाकात कर ली इन सबके पीछे केंद्र में जदयू के तीन मंत्री पद देने के लिए दबाव बनाने की रणनीति काम कर रही है। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार किसी तरह से इस बार केंद्र में भागीदारी चाहते हैं और अपने 16 लोकसभा सांसदों के दम पर कम से कम तीन मंत्री पद चाहते हैं। उनकी ओर से दो पिछड़ा और एक सवर्ण मंत्री बनाए जाने की चर्चा है। यह भी कहा जा रहा है कि एक सवर्ण, एक पिछड़ा और एक दलित भी मंत्री बन सकता है।

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