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राजरंग| नया इंडिया|

लोकसभा में उपाध्यक्ष की जरूरत नहीं

ऐसा लग रहा है कि केंद्र सरकार लोकसभा में उपाध्यक्ष की जरूरत नहीं समझ रही है। 17वीं लोकसभा के गठन के बाद संसद के तीसरे सत्र की घोषणा हो गई है। 31 जनवरी से बजट सत्र शुरू होगा और एक फरवरी को बजट पेश किया जाना है। यह नरेंद्र मोदी की दूसरी सरकार का दूसरा आम बजट होगा। पर अभी तक लोकसभा में उपाध्यक्ष बनाने के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है।

पिछली लोकसभा में सरकार ने अन्ना डीएमके नेता थंबी दुरैई को उपाध्यक्ष बनाया था। उससे पहले यूपीए के दूसरे कार्यकाल में भाजपा के बड़े आदिवासी नेता कड़िया मुंडा लोकसभा के उपाध्यक्ष होते थे। इस बार अभी तक सरकार ने फैसला नहीं किया है। बताया जा रहा है कि सरकार ऐसे नेता की तलाश में है, जिसे उपाध्यक्ष बनाया जा सके। संसदीय परंपराओं की वजह से भाजपा अपनी ही पार्टी का उपाध्यक्ष नहीं बना सकती है और वह किसी विपक्षी पार्टी को भी यह पद नहीं देना चाहती है। हालांकि परंपरा विपक्षी पार्टी के नेता को ही उपाध्यक्ष बनाने की रही है। सरकार किसी ऐसी पार्टी के नेता को तलाश रही है, जो भाजपा के प्रति सद्भाव रखने वाला हो। इस लिहाज से ले-देकर सरकार के पास बीजू जनता दल का विकल्प बचता है। उसने जदयू को राज्यसभा में उप सभापति का पद दे रखा है।

पहले जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस को यह पद देने की बात थी पर अब उसकी चर्चा थम गई है। भाजपा की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी शिव सेना उसे छोड़ कर जा चुकी है। हालांकि वह साथ में थी तब भी उसने उपाध्यक्ष का पद लेने से मना कर दिया था। टीआरएस, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, बसपा आदि लोकसभा की बड़ी पार्टियां हैं पर सरकार इनको यह पद नहीं देगी। सो, अगर बीजद सरकार के साथ दिखने को तैयार हो तो 31 जनवरी से शुरू हो रहे सत्र में उपाध्यक्ष नियुक्त होगा अन्यथा उसके बाद भी मामला टला रहेगा।

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