सरकार की कमाल की प्राथमिकता

केंद्र सरकार ने संसद में खड़े होकर साफ कह दिया कि लॉकडाउन में पलायन करने वाले मजदूरों की मौत का आंकड़ा उसके पास नहीं है और इसलिए मुआवजा देने का सवाल ही नहीं उठता है। साथ ही सरकार ने यह भी बता दिया कि पलायन करने वाले मजदूरों में से कितनों की नौकरी गई, इसका भी डाटा नहीं है। सोचें, श्रम व रोजगार मंत्रालय, जिसका काम ही मजदूरों का डाटा रखना है, उसने यह बात कही। पर ऐसा नहीं है कि सरकार डाटा जुटाने में सक्षम नहीं है। वह तो मजदूर सरकार की प्राथमिकता में नहीं थे इसलिए उनका डाटा नहीं जुटाया गया वरना उमर खालिद का तो 11 लाख पेज का डाटा जुटा लिया गया है। दिल्ली पुलिस ने उत्तरी दिल्ली के दंगों के सिलसिले में उमर खालिद को गिरफ्तार किया तो अदालत को बताया कि उमर के मोबाइल का 11 लाख पेज का डाटा पुलिस के पास है, जिसे दिखा कर उमर से पूछताछ करनी है।

इसी तरह सरकार ने मुंबई में एक फिल्म अभिनेता की मौत के मामले में केंद्र सरकार ने तीन एजेंसियों- सीबीआई, ईडी और एनसीबी को लगाया है। इन तीनों एजेंसियों ने मिल कर सबसे पहले यह पता लगाया कि मरने वाला फिल्मी सितारा नशा करता था। अब इन एजेंसियों के पास फिल्म उद्योग के उन सारे लोगों की सूची है, जो गांजा पीते हैं। इतना ही नहीं इस मामले में विलेन बना दी गई नवोदित अभिनेत्री के फोन का समूचा व्हाट्सऐप्प चैट पुलिस और एजेंसियों के पास है। मरने वाले सितारे से लेकर उसके ड्राइवर, खानसामे, मैनेजर, दोस्त, उसके परिवार के सदस्यों, विलेन बनाई गई अभिनेत्री और उसके पूरे परिवार के व्हाट्सऐप्प चैट का ब्योरा है, जिले महीनों से चैनल वाले दिखा रहे हैं। बस सरकार के पास पलायन करने वाले मजदूरों का डाटा नहीं है।

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