न एनआरसी मुद्दा और न सीएए!

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पिछले साल के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का मुद्दा नहीं उठाया तो माना गया कि नीतीश कुमार के साथ एलायंस की वजह से पार्टी चुप रही है। तब यह माना जा रहा था कि पश्चिम बंगाल और असम का चुनाव भाजपा इन्हीं दोनों मुद्दों पर लड़ेगी। पर हैरानी की बात है कि अभी तक ये दोनों मुद्दे नदारद हैं। भाजपा के किसी न किसी बड़े नेता की रोज रैली हो रही है। लेकिन कोई भी यह मुद्दा नहीं उठा रहा है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा ने यह मुद्दा न असम में उठाया और न पश्चिम बंगाल में। यहां तक कि स्मृति ईरानी ने भी बंगाल में रैली को संबोधित किया तो यह मुद्दा नहीं उठाया।

इस बीच खबर है कि असम में भाजपा की सरकार एनआरसी को लागू ही नहीं कर रही है। ध्यान रहे असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नागरिक रजिस्टर का काम हुआ है और एनआरसी बन कर तैयार है। राज्य में 19 लाख लोगों का नाम इसमें शामिल नहीं है। सरकार इसे मान्यता देगी तो इन लोगों से दस्तावेज मांगे जाएंगे और इनकी जांच होगी। याद करें, अमित शाह ने पिछले दौरे में असम में क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि भाजपा ही घुसपैठियों को बाहर कर सकती है लेकिन घुसपैठियों की पहचान करके एनआरसी बनी हुई तो भाजपा की सरकार उसे लागू ही नहीं कर रही है!

असल में भाजपा को इस बात की चिंता है कि अगर सीएए पर जोर दिया और पड़ोसी देशों से आए लोगों को नागरिकता देनी शुरू की तो बंगाल में कितना फायदा होगा, यह नहीं कह सकते पर असम में भारी नुकसान होगा। असमी संस्कृति की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन तेज हो जाएंगे। चुनाव के समय पार्टी इसकी जोखिम नहीं ले सकती है। इसी तरह एनआरसी पर अमल किया तो बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आए बांग्लाभाषी हिंदुओं को भी बाहर करना पड़ेगा, जिसका नुकसान असम और बंगाल दोनों जगह होगा। संभवतः इसलिए भाजपा ने चुप्पी साधी है।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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