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जदयू का सरकार में शामिल होना मुश्किल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले हफ्ते दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की तो सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर थी कि उनकी पार्टी जनता दल यू केंद्र सरकार में शामिल हो सकती है। लेकिन ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार खुद नहीं चाहते हैं कि वे केंद्र सरकार में हिस्सा बनें क्योंकि इससे पार्टी के अंदर शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। दूसरे, जिन वजहों से उनकी पार्टी मई 2019 में सरकार में नहीं शामिल हुई थी वह वजह अब भी है। उस मामले में भाजपा और प्रधानमंत्री के रुख में कोई बदलाव आया नहीं दिख रहा है।

गौरतलब है कि मई 2019 में प्रधानमंत्री के तौर पर जब नरेंद्र मोदी दूसरी बार शपथ ले रहे थे तब उन्होंने सहयोगी पार्टियों को सरकार में शामिल करने का एक फॉर्मूला बनाया था। उस फॉर्मूले के मुताबिक हर सहयोगी पार्टी का एक सदस्य केंद्र में मंत्री बनने वाला था, चाहे उसके जितने भी सांसद हों। इस फॉर्मूले के तहत सिर्फ एक राज्यसभा सांसद वाली आरपीआई के नेता रामदास अठावले मंत्री बने। दो लोकसभा सांसदों वाली पार्टी अकाली दल से हरसिमरत कौर बादल मंत्री बनीं और 17 लोकसभा सांसदों वाली शिव सेना से भी एक अनंत गीते मंत्री बने।

उस समय इस फॉर्मूले के तहत जदयू की ओर से आरसीपी सिंह को मंत्री बनना था। वे इसके लिए तैयार भी गए थे पर नीतीश कुमार ने प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व लेने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी पार्टी को सीटों की संख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलेगा, तभी सरकार में शामिल होंगे। जानकार सूत्रों का कहना है कि लोकसभा में जदयू के नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने नीतीश के सामने यह मुद्दा बनाया था कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं लेना चाहिए। अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री जदयू को उसकी सीटों की संख्या के हिसाब से तीन या चार मंत्री पद देने को राजी होंगे? इसमें संदेह है। जब बिहार विधानसभा में जदयू के पास भाजपा से ज्यादा सीटें थीं तब प्रधानमंत्री एक मंत्री पद दे रहे थे, अब भाजपा के पास जदयू से डेढ़ गुने से ज्यादा सीटें हैं, तब प्रधानमंत्री क्यों अपना फॉर्मूला बदलेंगे!

इसका मतलब है कि अगर जदयू को सरकार में शामिल होना है तो एक मंत्री पद का प्रस्ताव स्वीकार करना होगा। अब चूंकि आरसीपी सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए हैं इसलिए उनको मंत्री पद की रेस से बाहर माना जा रहा है। ऐसे में अगर एक पद लेकर जदयू सरकार में शामिल होने पर राजी होती है तो वह पद ललन सिंह को मिलेगा। आरसीपी सिंह इस मामले में रोड़ा अटका सकते हैं। जिस कारण से वे खुद मंत्री नहीं बन पाए थे वहीं कारण फिर सामने ला देंगे। दूसरे, नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी का पिछड़ा और खास कर लव-कुश यानी कुर्मी-कोईरी का जो रूप बना रहे हैं उसमें ललन सिंह के मंत्री बनने से मुश्किल आएगी। इस समय वे सवर्ण नेतृत्व आगे करने के मूड में नहीं हैं। तीसरी बात यह भी है कि आजकल सारे क्षत्रप केंद्र के साथ सद्भाव रखते हैं लेकिन अपने लोगों को केंद्र में मंत्री नहीं बनाते हैं।

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