सरकार के लिए विपक्ष का मतलब नहीं

देश की विपक्षी पार्टियां क्यों सरकार और सत्तारूढ़ दल के खिलाफ इतनी आक्रामक हो रही हैं? पहले भी सरकारों के साथ विपक्ष का टकराव होता था और विरोध-प्रदर्शन भी होते थे पर इस तरह से दुश्मनी जैसी खुन्नस नहीं बनती थी। इस बार ऐसा हो रहा है तो इसका कारण यह है कि सरकार ने विपक्षी पार्टियों का मतलब पूरी तरह से खत्म कर दिया है और कांग्रेस सहित लगभग विपक्षी पार्टियां इसको समझ रही हैं। इतना ही नहीं सरकार का साथ देने वाली पार्टियों को भी लग रहा है कि सरकार उनको कोई भाव नहीं दे रही है। संसद में जब जरूरत होती है तो भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के मंत्री बात करते हैं। उसके अलावा कोई पूछ नहीं है।

कांग्रेस के एक जानकार नेता ने कहा है कि इस समय के ऐतिहासिक संकटों को लेकर अगर सरकार ने विपक्ष को भरोसे में लिया होता और सभी मसलों पर विपक्ष के साथ औपचारिक या अनौपचारिक रूप से बात की होती तो टकराव इतना नहीं बढ़ता। गौरतलब है कि 15 जून को जब लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों में झड़प हुई और भारत के 20 जवान शहीद हुए उसके बाद प्रधानमंत्री ने एक सर्वदलीय बैठक की थी। उसमें विपक्षी नेताओं ने क्या राय दी उससे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री के इस दावे पर हो गई कि कोई भी भारत की सीमा न घुसा है और घुस आया है। इसके बाद सरकार ने विपक्ष से कोई बात नहीं की। यहां तक राज्यसभा में रक्षा मंत्री के इस मसले पर बयान देने के बाद सभापति ने कहा था कि सदन के नेताओं के साथ बैठक करके उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। पर सरकार ने उसकी भी जरूरत नहीं समझी।

ऐसे ही कृषि के मामले में सरकार ने एकतरफा तरीके से जून में अध्यादेश जारी कर दिया और संसद के मॉनसून सत्र में बिल पेश कर दिया। अध्यादेश जारी करने के बाद भी सरकार ने विपक्ष से या किसान संगठनों से बातचीत करने की जरूरत नहीं समझी। संसद में भी विपक्ष को नहीं सुना गया और संसद की समितियों में इस बिल को भेजने की मांग भी खारिज कर दी गई। विपक्षी पार्टियां इस बात को लेकर आहत हैं कोरोना के ऐतिहासिक संकट के मामले में या कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था में आई ऐतिहासिक गिरावट के मसले पर भी सरकार की ओ से विपक्ष को भरोसे में लेने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।

विपक्षी पार्टियों का कहना है कि सारे राज्य इस समय घनघोर आर्थिक संकट में फंसे हैं। लेकिन केंद्र सरकार उनकी मदद करने की बजाय अलग अलग कानून बना कर उनके अधिकार कम करने में लगी है। कृषि से लेकर बैंकिंग तक हुए बदलावों को विपक्षी पार्टियां संघवाद के सिद्धांत पर हमला बता रही हैं। विपक्षी शासन वाले राज्यों ने राहत पैकेज मांगना बंद कर दिया है अब वे जीएसटी में अपने हिस्से का पैसा मांग रहे हैं और सरकार उस पर भी ध्यान नहीं दे रही है।

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