कांग्रेस कमान दूसरा मोर्चा : राजनीति कांग्रेस की कमान में दूसरा मोर्चा Naya India
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कांग्रेस की कमान में दूसरा मोर्चा

कांग्रेस कमान दूसरा मोर्चा

कांग्रेस की कमान दूसरा मोर्चा : ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा और शरद पवार की तिकड़मी राजनीति ने कांग्रेस पार्टी खास कर राहुल गांधी और उनकी टीम की नींद उड़ाई है। उनको लगने लगा है कि विपक्ष की कई पार्टियां मिल कर मुख्य या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के जगह से कांग्रेस को विस्थापित करना चाहती हैं। गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दलों के बीच एक अनकही सहमति बन रही है। कांग्रेस के एक जानकार नेता का कहना है कि मौजूदा यूपीए भी अगले चुनाव तक इसी तरह बना रहेगा, इसकी संभावना कम है। कांग्रेस नेताओं को लग रह है कि यूपीए की कई पार्टियां अलग राजनीति कर सकती हैं और तीसरे मोर्चे के साथ जा सकती हैं।

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कांग्रेस कमान दूसरा मोर्चा

इसलिए कांग्रेस पार्टी में दूसरा मोर्चा बनाने पर विचार हो रहा है। दूसरा मोर्चा राहुल गांधी उन नेताओं के साथ मिल कर बनाएंगे, जिनसे उनके निजी संबंध बहुत अच्छे हैं और जिनके बारे में उनको और उनकी टीम को यकीन है कि वे किसी हाल में भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। दूसरे मोर्चे या गैर यूपीए राजनीति के लिए राहुल के पास तुरुप का पत्ता एमके स्टालिन हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद स्टालिन पहली बार दिल्ली आए तो अपनी पत्नी के साथ सोनिया गांधी से मिलने गए। वहां सोनिया और राहुल के साथ दोनों ने बहुत अच्छी और आत्मीय तस्वीर खिंचवाई।

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कांग्रेस कमान दूसरा मोर्चा

राहुल गांधी के जन्मदिन 19 जून को सबसे गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ बधाई स्टालिन ने दी। स्टालिन ने उनको ‘डियरेस्ट ब्रदर’ लिख कर बधाई दी। अगले चुनाव में स्टालिन बहुत बड़े रोल में होंगे। वे दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं, इस नाते वे दक्षिणी राज्यों की साझा राजनीति का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। राहुल उनके साथ मिल कर दूसरे मोर्चे की योजना बना सकते हैं। दूसरे मोर्चे में स्टालिन के अलावा दूसरे नेता तेजस्वी यादव होंगे। उनके साथ राहुल के संबंध अच्छे हैं और 40 लोकसभा सीटों वाले बिहार के लिए उनके साथ अच्छा समीकरण राहुल बना सकते हैं।

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कांग्रेस कमान दूसरा मोर्चा : कांग्रेस और राहुल गांधी की असली चिंता उत्तर प्रदेश और अखिलेश यादव की है। वे देश की गिनी-चुनी पार्टियों में से एक का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो घोषित रूप से कभी भाजपा के साथ नहीं गई है और आगे भी नहीं जाएगी। कांग्रेस के जानकार सूत्रों के मुताबिक पार्टी उनके साथ अगले लोकसभा चुनाव की प्लानिंग कर सकती है। उससे पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उनकी मदद करेगी। कांग्रेस के मदद करने का मतलब है कि वह इस तरह से उम्मीदवार उतारे कि भाजपा को नुकसान हो और सपा को फायदा। इस तरह की राजनीति कांग्रेस पार्टी नब्बे के दशक में बिहार में करती रही है। लालू प्रसाद ऐसे ही कांग्रेस का इस्तेमाल करते थे। हेमंत सोरेन कांग्रेस के भरोसे के लायक नहीं हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि झारखंड में कांग्रेस के बगैर उनका काम नहीं चलेगा। इसलिए उनको भी दूसरे मोर्चे की राजनीति में शामिल किया जा सकता है।

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