जीएसटी भी दलगत राजनीति का शिकार

वस्तु व सेवा कर को देश के सभी राज्यों की सरकारों की सहमति से बनाया गया था। जब इसकी परिकल्पना की गई थी तो उसमें एक बात पहले दिन से शामिल थी कि इस पर विचार के लिए बनी राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति का अध्यक्ष ऐसे राज्य के वित्त मंत्री को बनाया जाएगा, जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल का विपक्ष हो। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि विपक्षी शासन वाले राज्यों को यह भरोसा रहे कि केंद्र सरकार उनके हितों को खत्म नहीं कर रही है। हालांकि बाद में जीएसटी का कानून बन गया और जीएसटी कौंसिल बन गई तो उसकी कमान केंद्रीय वित्त मंत्री को दे दी गई।

कानून बनने के तीन साल के भीतर अब यह कौंसिल राजनीति का शिकार हो गई है। पूरा कानून ही दलगत राजनीति के दायरे में आ गया है। केंद्र सरकार ने जीएसटी के मुआवजे के भुगतान पर जो लाइन तय की है और उपाय सुझाए हैं वह राज्यों की आर्थिक कमर तोड़ देने वाली है। पर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के शासन वाले राज्यों ने खुशी खुशी उस फॉर्मूले को स्वीकार कर लिया है। भाजपा के शासन वाली सभी राज्य सरकारों ने कर्ज लेने का फॉर्मूला मान लिया है और अपना विकल्प जीएसटी कौंसिल के सामने पेश कर दिया है। एक दर्जन से ज्यादा राज्य सरकारों में भाजपा शासित राज्यों के साथ साथ बिहार की सहयोगी पार्टी की सरकार और ओड़िशा की परोक्ष सहयोगी की सरकार भी शामिल है।

अब विरोध सिर्फ पांच-सात कांग्रेस व विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्य कर रहे हैं। तो समझना मुश्किल नहीं है कि इनके विरोध का क्या हस्र होगा। पर ऐसा नहीं है कि बाद में मुश्किल सिर्फ इन राज्यों के लिए आने वाली है। भाजपा की जो राज्य सरकारें अपनी पार्टी के केंद्रीय सरकार को शर्मिंदगी में डालने से बचने के लिए कर्ज लेने का फॉर्मूला मान रही हैं, उनको भी बड़ी दिक्कत आने वाली है।

इस समय कहा जा रहा है कि जीएसटी राजस्व की वसूली में जो कमी हुई है, उसकी भरपाई के लिए राज्य कर्ज ले लें और बाद में मुआवजे की वसूली हो जाए तो उससे चुका देंगे। पर सवाल है कि अगर वसूली फिर भी कम रही है तो क्या होगा? कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस के संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से राजस्व संग्रह कम हुआ है। पर यह हकीकत नहीं है। राजस्व संग्रह पिछले साल अगस्त से ही कम हो गया है। जीएसटी के ऊपर मुआवजे के लिए जो सेस लगाया गया है उसकी वसूली एक साल से कम हो रही है। उस वसूली की प्रत्याशा में जो राज्य सरकार नए कर्ज ले रहे हैं वह चुकाना उनके लिए उसे चुकाना बहुत मुश्किल होगा। चूंकि कर्ज राज्य सरकारें अपने खाते में ले रही हैं इसलिए केंद्र सरकार उसे चुकाने के लिए बाध्य नहीं है। अंत में वह कर्ज राज्यों को ही चुकाना होगा, चाहे जीएसटी में मुआवजे के लिए लगाए गए सेस से पर्याप्त कर संग्रह हो या नहीं हो। राज्य इस बात को समझ रहे हैं पर दलगत राजनीति के चक्कर में राज्य को दलदल में फंसा रहे हैं।

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