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सहमति से सरकार चलाने का गुण किसने सीखा

पूर्व राष्ट्रपति, भारत रत्न प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद उनके लिए जितनी श्रद्धांजलि लिखी गई है या उनके राजनीतिक योगदान पर जितना कुछ लिखा-कहा गया है उसकी केंद्रीय थीम यह है कि वे सहमति बनाने में माहिर राजनेता थे और उन्होंने सरकार के कामकाज में सहमति की अनिवार्यता को कायम रखा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रणब मुखर्जी को सहमति बनाने में माहिर थे और जैसा कि कई जानकारों ने लिखा कि वे किसी भी विवाद और बहस को आम सहमति में बदलने की क्षमता रखते थे। हालांकि सरकार में और कांग्रेस पार्टी में उनके भी विवाद हुए और कई विवाद वे खुद भी सुलझा नहीं पाए। फिर भी वे सहमति के महत्व को समझने वाले नेता थे।

सवाल है कि जितने नेता उनको श्रद्धांजलि दे रहे हैं, पितातुल्य, शिक्षक या गाइड बता रहे हैं उनमें से किसने सहमति बनाने का गुण सीखा है? कांग्रेस पार्टी भी जब यूपीए की सरकार का नेतृत्व कर रही थी तब प्रणब मुखर्जी उस सरकार में मंत्री थे पर पार्टी और सरकार के लोगों ने सहमति की बजाय मनमाने तरीके से ही काम किया। तभी अपने ही सहयोगियों को छापे पड़े और उनको जेल जाना पड़ा, जिसका खामियाजा 2014 में कांग्रेस को भुगतना पड़ा। आरएसएस के पदाधिकारियों ने उनको गाइड बताया तो प्रधानमंत्री ने पितातुल्य बताया लेकिन यह सरकार भी किसी मसले पर सहमति के बारे में नहीं सोचती है।

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