प्लाज्मा थेरेपी का क्या रहस्य है?

सात-आठ महीने पहले भारत में कोरोना वायरस की लड़ाई जिन हथियारों से शुरू हुई थी उनमें से ज्यादातर के बारे में कहा जा रहा है कि वे बेकार के हथियार हैं और कोरोना को रोकने या मृत्यु दर कम करने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। प्लाज्मा थेरेपी भी उनमें से एक है। खबर है कि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर अब प्लाज्मा थेरेपी पर रोक लगाने जा रही है। बताया जा रहा है कि आईसीएमआर के निर्देश पर इसे क्लीनिकल प्रोसेस से बाहर कर दिया जाएगा।

परंतु दूसरी ओर दिल्ली सरकार का दावा है कि दिल्ली में प्लाज्मा थेरेपी से दो हजार लोगों का इलाज हुआ है और उनको फायदा हुआ है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन दोनों का इलाज प्लाज्मा थेरेपी से हुआ और दोनों स्वस्थ हुए हैं। सत्येंद्र जैन ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा है कि अगर किसी को संदेह है तो वह ठीक हुए मरीजों के घर जाकर उनसे पूछ सकता है। अगर दो हजार लोग इस इलाज से ठीक हुए हैं तो यह मामूली आंकड़ा नहीं है।

फिर सवाल है कि आईसीएमआर क्यों इसे बंद करने पर तुला है? किसी रिसर्च से आईसीएमआर को पता चला है कि यह इलाज कारगर नहीं हो रहा है? आईसीएमआर ने कोई रिसर्च कराया है या सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ के कहने पर प्लाज्मा थेरेपी पर रोक लगाई जा रही है? ऐसा लग रहा है कि भारत की यह शीर्ष संस्था आंख मूंद कर डब्लुएचओ के निर्देशों का पालन कर रही है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि डब्लुएचओ वहीं कह रहा है, जो दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां चाह रही हैं। तभी वह पहले दिन से इस चिकित्सा प्रणाली के खिलाफ है। असल में दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां चाहती हैं कि प्लाज्मा थेरेपी या किसी भी वैकल्पिक चिकित्सा को खारिज किया जाए ताकि कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं का बाजार बना रहे। ध्यान रहे प्लाज्मा थेरेपी के दिल्ली में कारगर होने की मिसाल है और अमेरिका के रिसर्च में भी इस पर सकारात्मक नतीजे आए हैं।

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