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राजरंग| नया इंडिया|

25 फीसदी आबादी का क्या कसूर?

भारत सरकार ने वैक्सीनेशन नीति में एक बार फिर भेदभाव कर दिया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसी पर सवाल उठाया था। केंद्र सरकार देश में बनने वाली वैक्सीन डोज में से सिर्फ 75 फीसदी डोज खरीदेगी। बाकी 25 फीसदी डोज निजी अस्पताल खरीदेंगे। निजी अस्पतालों के लिए वैक्सीन की कीमत भी तय कर दी गई है। भारत की स्वदेशी वैक्सीन भारत बायोटेक की कोवैक्सीन उनको 1,410 रुपए प्रति डोज के हिसाब से मिलेगी। रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी की कीमत 1,145 रुपए होगी और कोवीशील्ड उनको 780 रुपए में मिलेगी। इसके ऊपर वे डेढ़ सौ रुपया सर्विस चार्ज लेंगे। सवाल है कि जब केंद्र सरकार ने सबको मुफ्त वैक्सीन लगाने की नीति बनाई है तो फिर उसमें इतनी महंगी वैक्सीन लगाने का स्कोप कहां से बचता है? जब उच्च वर्ग के लिए भी प्रधानमंत्री ने मुफ्त वैक्सीन की घोषणा की है तो सरकार किन लोगों से उम्मीद कर रही है कि वे इतनी महंगी वैक्सीन लगवाने निजी अस्पताल में जाएंगे?

अगर सरकारी अस्पतालों में या सरकारों के बनवाए केंद्रों पर मुफ्त में वैक्सीन लगेगी तो दो हजार रुपए या उससे ज्यादा वैक्सीन पर कौन खर्च करेगा? ध्यान रहे केंद्र सरकार 75 फीसदी ही वैक्सीन खरीदेगी, इसका मतलब है कि वह सिर्फ 75 फीसदी लोगों को ही वैक्सीन लगवाएगी बाकी 25 फीसदी को अनिवार्य रूप से निजी अस्पतालों में लगवाना होगा या लंबा इंतजार करना होगा। सोचें, अगर लोगों दो-चार फीसदी लोगों को छोड़ कर बाकी लोगों ने सरकारी वैक्सीन लगवाने का इंतजार करने का फैसला किया तो निजी अस्पताल जो वैक्सीन खरीदेंगे उनका क्या होगा? यह भी सवाल है कि कई राज्यों ने सभी नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन लगवाने का चुनावी वादा किया है क्या वे अपने यहां निजी अस्पतालों में इतनी महंगी वैक्सीन लगाने की इजाजत देंगे?तभी प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद से इस पर चर्चा हो रही है कि आखिर सरकार क्यों नहीं सारी वैक्सीन खरीद रही है और निजी अस्पतालों को भी वैक्सीन मुहैया करा रही है? उन्हें वैक्सीन मुफ्त मिले तो वे डेढ़ सौ रुपए सर्विस चार्ज लेकर वैक्सीन लगा सकते हैं। इस तरह ज्यादा तेजी से वैक्सीनेशन होगा।

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