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राजनीतिक चंदे के बारे में जानना लोक हित है

सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं या सामाजिक सरोकार वाले दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं या न्यायिक सेवाओं के लोगों को सूचना आयोग में नियुक्त करने की बजाय रिटायर सरकारी बाबुओं को सूचना आयोग में बैठाने की सरकार की रणनीति खूब काम आ रही है। केंद्र सरकार ने नवंबर में भारतीय विदेश सेवा के रिटायर अधिकारी यशवर्धन कुमार सिन्हा को केंद्रीय सूचना आयोग का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया। इसे लेकर बड़ा विवाद हुआ, लेकिन जैसा कि इस सरकार की खासियत है, उसने अपना फैसला नहीं बदला। अब देश के मुख्य सूचना आयुक्त ने एक आरटीआई कार्यकर्ता के आवेदन के जवाब में आदेश दिया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के बारे में जानकारी सार्वजनिक करना लोक हित का काम नहीं है।

सोचें, यह कैसे लोक हित का काम नहीं है? देश का आवाम जिन पार्टियों और नेताओं को अपना कीमती वोट देता है, अपने वोट से अपना और देश का रहनुमा चुनता है वे लोग किसके चंदे पर चुनाव लड़ रहे हैं यह जानना कैसे लोक हित नहीं है? किसी भी लोकतंत्र में इससे बड़ा लोक हित क्या हो सकता है? राजनीतिक दल चलाना कोई मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा या गिरजाघर चलाना नहीं है, जहां लोग जाकर गुप्त दान करें! अगर कोई उद्योगपति या कारोबारी किसी राजनीतिक दलों को चंदा देता है तो निश्चित रूप से अपना कुछ स्वार्थ होता है। इसलिए आम लोगों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि पार्टियां किन लोगों के चंदे से चल रही हैं और चुनाव लड़ रही हैं। पर एक तो पहले केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था लागू करके चंदे की सारी पारदर्शिता बदल दी। उसके बाद आरटीआई के जरिए जानकारी हासिल करने का जो रास्ता था उसे मुख्य सूचना आयुक्त यशवर्धन सिन्हा ने बंद कर दिया।

हैरानी की बात यह है कि उनसे पहले भी मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर रिटायर अधिकारी ही थे लेकिन उन्होंने सरकार को नोटिस जारी किया था और कहा था कि सरकार बताए कि ऐसे कितने लोग हैं, जिन्होंने चंदा दिया है और अपनी पहचान गोपनीय रखना चाहते हैं। जनवरी में यह सवाल पूछा गया था। लगता है कि सरकार ने इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझा है और अब दिसंबर में नए मुख्य सूचना आयुक्त ने चंदे की जानकारी देने को लोक हित का काम नहीं मानने का फैसला दिया है।

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