कांग्रेसियों की महत्वाकांक्षा आत्मघाती

कांग्रेस पार्टी को लेकर एक खास बात है, जो इसे भाजपा या दूसरी पार्टियों से अलग करती है। वह बात ये है कि कांग्रेस काडर आधारित या किसी खास जाति के वोट बैंक के सहारे राजनीति करने वाली पार्टी नहीं है। काडर आधारित पार्टियों में या जातिगत वोट बैंक वाली पार्टियों का कोई नेता अगर पार्टी छोड़ता है तो उसका सफल होना नामुमकिन सा होता है। पर कांग्रेस से निकल कर कोई भी सफल हो जाता है क्योंकि उसका कोई कैप्टिव वोट बैंक नहीं है। कांग्रेस की तरह राजनीति करने वाला कोई व्यक्ति कांग्रेस से बाहर भी सफल हो जाता है। लेकिन यह भी हकीकत है कि कांग्रेस छोड़ कर काडर आधारित पार्टी जैसे भाजपा में जाने वाले नेता सफल नहीं हो पाते हैं। वे एक निश्चित सीमा तक तरक्की करते हैं पर कांग्रेस में रहते वे अपनी जिस महत्वाकांक्षा के पूरा नहीं होने का विरोध करते हैं वह भाजपा में जाकर तो कतई पूरी नहीं होती।

मिसाल के तौर पर हिमंता बिस्वा सरमा को देखा जा सकता है। वे असम में तरुण गोगोई के समय भी कांग्रेस में नंबर दो नेता थे और अब भाजपा में जाने के बाद भी नंबर दो ही नेता हैं। अब ज्यादा से ज्यादा वे केंद्र में मंत्री बन सकते हैं। उन्होंने पूर्वोत्तर में भाजपा की कई सरकारें बनवा दीं पर भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज थे। पर भाजपा में भी वे मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले हैं। हरियाणा के नेता बीरेंद्र सिंह राज्य की राजनीति में भूपेंदर सिंह हुड्डा को मिलने वाले महत्व से नाराज थे और इसलिए भाजपा में चले गए पर वहां भी उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश के जगदंबिका पाल और कर्नाटक के एसएम कृष्णा की मिसाल भी देखी जा सकती है। झारखंड में तो कांग्रेस के दो दिग्गज नेता मनोज यादव और सुखदेव भगत भाजपा में गए और अब दोनों वहां हाशिए में पड़े हैं। तभी सचिन पायलट को सद्बबुद्धि आई है और उन्होंने कहा है कि वे भाजपा में नहीं जाएंगे।

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