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कांग्रेस के सहयोगियों की मनमानी

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कांग्रेस पार्टी के नेता ऊपर से चाहे कितना भी दम दिखाएं लेकिन हकीकत यह है कि पार्टी अंदर से कमजोर हो गई है और उस वजह से हर पार्टी और नेता आंखें दिखा रहा है। सत्तापक्ष के हमले और विपक्ष की अनदेखी के बीच कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां भी कांग्रेस को नीचा दिखा रही हैं और मनमानी कर रही हैं। और इसी में कांग्रेस के नेता अपने छोटे छोटे लाभ के लिए पार्टी की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी का अपमान करा रहे हैं। बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र में सहयोगी पार्टियों ने कांग्रेस के साथ जैसा बरताव किया है वह कांग्रेस और आलाकमान की स्थिति बताने के लिए पर्याप्त है।

बिहार में कांग्रेस पार्टी राजद और जदयू की सरकार में शामिल हुई है। जिस दिन नीतीश कुमार की कमान में भाजपा की नई सरकार बनी उसके अगले दिन राजद नेता और नए उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव दिल्ली आए। उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात की। उसके बाद ऐसी खबरें चलीं कि उन्होंने सोनिया से मंत्रिमंडल गठन, उसमें कांग्रेस की हिस्सेदारी और मंत्रालयों के बारे में बात की। लेकिन जब मंत्रियों की शपथ हुई तो कांग्रेस के सिर्फ दो मंत्री बने। सोचें 19 विधायक और दो मंत्री! क्या यह सोनिया गांधी की सहमति से हुआ था? इन दो मंत्रियों में से भी एक को पंचायती राज और दूसरे को मछली व पशुपालन का मंत्री बनाया गया।

इसी तरह इस साल अप्रैल में जब राज्यसभा के चुनाव होने थे तब झारखंड में कांग्रेस ने एक सीट पर दावेदारी थी। यह जायज दावेदारी थी क्योंकि पिछली बार जेएमएम कोटे से शिबू सोरेन राज्यसभा गए थे। चूंकि राज्य की सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है इसलिए स्वाभाविक रूप से कांग्रेस का दावा इस सीट पर था। लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसके लिए मना कर दिया। तब सोनिया गांधी ने उनको बुला कर बात की। उन्होंने सोनिया से कहा कि वे रांची जाकर अपनी पार्टी में बात करेंगे। लेकिन बात क्या करनी थी उन्होंने रांची जाकर अपनी पार्टी के उम्मीदवार की घोषणा कर दी। यहीं काम उन्होंने राष्ट्रपति के चुनाव में भी किया। कांग्रेस और साझा विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा थे, जो झारखंड के ही रहने वाले थे लेकिन हेमंत सोरेन ने उनकी बजाय एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को वोट किया।

उधर महाराष्ट्र में भी दोनों सहयोगी पार्टियों ने कांग्रेस को किनारे लगाया हुआ है। जब सरकार थी तब भी कांग्रेस के मंत्रियों की पूछ नहीं थी और सरकार गई तो विपक्ष को मिलने वाले सारे पद एनसीपी और शिव सेना के पास चले गए। विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी दल के नाते नेता विपक्ष का पद एनसीपी ने ले लिया तो डिप्टी स्पीकर का पद पहले से शिव सेना के पास है। विधान परिषद में उप सभापति का पद भी शिव सेना के पास है इसलिए कांग्रेस उच्च सदन में नेता का पद चाहती थी लेकिन शिव सेना ने आनन-फानन में वह पद भी हथिया लिया।

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