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ढाई ढाई साल का फॉर्मूला कारगर नहीं

ByNI Political,
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अभी आधिकारिक रूप से कांग्रेस की तरफ से इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि सिद्धरमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता के बंटवारे का फॉर्मूला बना है। खुद शिवकुमार ने भी कहा कि पार्टी के हित में उन्होंने फॉर्मूला स्वीकार किया है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि फॉर्मूला क्या है। लेकिन अगर सत्ता की साझेदारी पर बात हुई है और तय हुआ है कि ढाई ढाई साल तक बारी बारी से दोनों मुख्यमंत्री रहेंगे तो यह समझने की जरूरत है कि ऐसा कोई फॉर्मूला कभी कारगर नहीं हुआ है। कई राज्यों में इस तरह का फॉर्मूला घोषित या अघोषित रूप से बना और फेल हुआ। कुछ राज्यों में तो फॉर्मूला बनाने की कोशिश ही कामयाब नहीं हुई।

महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव के बाद शिव सेना के नेता उद्धव ठाकरे ने इस फॉमूले की बात की थी। उन्होंने भाजपा के साथ सत्ता की साझेदारी बनाने का दावा किया और कहा कि चुनाव से पहले अमित शाह ने उनसे कहा था कि दोनों पार्टियों के नेता बारी बारे से मुख्यमंत्री बनेंगे। हालांकि भाजपा ने इससे इनकार किया। सो, सत्ता में साझेदारी का फॉर्मूला नहीं बन पाया और दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया। शिव सेना ने तब कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर अपनी सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहे।

इसी तरह छत्तीसगढ़ में 2018 में कांग्रेस जीती तो भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। लेकिन राज्य के नंबर दो मंत्री टीएस सिंहदेव ने बाद में दावा किया कि कांग्रेस आलाकमान ने ढाई साल के बाद उनको मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था। बघेल सरकार के ढाई साल पूरा होने के मौके पर बहुत उथलपुथल हुई थी। बघेल और सिंहदेव के समर्थक कई दिन तक दिल्ली में डेरा डाले रहे थे। सिंहदेव मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग करते रहे लेकिन बघेल ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि ढाई साल के बाद सत्ता का हस्तांतरण होना था। कांग्रेस आलाकमान ने भी इस पर चुप्पी साध ली। शिवकुमार को यह कहानी पता है। फर्क यह है कि सिंहदेव के मुकाबले शिवकुमार बहुत ज्यादा ताकतवर हैं। अगर फॉर्मूला बना है तो ढाई साल के बाद वे चुप नहीं बैठेंगे, जो काम सिंहदेव नहीं कर सके वह काम शिवकुमार कर देंगे।

बहरहाल, इसी तरह सत्ता में साझेदारी का एक फॉर्मूला भाजपा और बहुजन समाज पार्टी के बीच उत्तर प्रदेश में बना था। 1996-97 में भाजपा और बसपा की साझा सरकार बनी थी और यह फॉर्मूला तय हुआ था कि दोनों पार्टियों के नेता बारी बारी से छह छह महीने सरकार चलाएंगे। मायावती पहले छह महीने के लिए मुख्यमंत्री रहीं। छह महीने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। लेकिन मायावती ने एक महीने में समर्थन वापस लेकर कल्याण सिंह की सरकार को गिरा दिया।

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