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प्रणब मुखर्जी के सुर क्यों बदले हैं

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सुर बदले हैं। राष्ट्रपति रहते और पद से हटने के बाद भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। मोदी के प्रति उनका सद्भाव समय समय पर जाहिर होता रहा है। मोदी भी उनके प्रति खुल कर सम्मान दिखाते रहते हैं। इस साल विजयादशमी के मौके पर प्रणब मुखर्जी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। पर पिछले एक हफ्ते से उनके सुर बदले हुए हैं। वे सरकार के बहुमत से लेकर कामकाज और मीडिया के रवैए पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कम से कम दो कार्यक्रमों में ऐसे भाषण दिए हैं, जिनसे लगा है कि उनकी अलग लाइन है।

पहले वे आरएसएस और भाजपा के प्रति सद्भाव रखने वाले संगठन इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के कार्यक्रम में गए थे, जहां उन्होंने सरकार को नसीहत देने के अंदाज में कहा कि उसे उन लोगों को भी साथ लेकर चलना चाहिए, जिन्होंने उसको वोट नहीं दिया हो। नागरिकता कानून और अल्पसंख्यकों की चिंताओं को देखते हुए उनका यह बयान अहम है। प्रणब मुखर्जी ने यह भी कहा कि भारत में कभी भी किसी भी सरकार को जनता का पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है। भले सीटें बहुमत से ज्यादा आ जाएं पर यह संभव नहीं है कि देश के मतदाताओं का बहुमत सरकार को मिले।

ध्यान रहे केंद्र की मौजूदा सरकार को 303 सीटें हैं पर वोट उसे 36 फीसदी ही मिले हैं। मतदाताओं के बहुमत का मतलब है 50 फीसदी से कम से कम एक वोट ज्यादा मिलना। बहरहाल, दूसरा कार्यक्रम एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का था, जिसमें प्रणब मुखर्जी ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने बहुत साफ शब्दों में कहा कि देश की मीडिया के साथ अभी सब कुछ ठीक नहीं है। गौरतलब है कि देश का मीडिया इस समय वहीं दिखा रहा है, जो सरकार चाह रही है। तभी उनके इस बयान को भी बहुत बारीकी से देखा जा रहा है।

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