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Thursday, May 13, 2021
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बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व का सवाल

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झारखंड में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी उम्मीदों के साथ अपने पुराने नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी में वापसी कराई थी। विधानसभा चुनाव में भाजपा के हारने के बाद मरांडी की पार्टी में वापसी हुई थी और आते ही पार्टी ने उनको विधायक दल का नेता बनाया था। यह अलग बात है कि अपनी पार्टी में टूट-फूट की वजह से उनकी सदस्यता पर सवाल उठा है और अभी तक विधानसभा में उनको नेता विपक्ष का पद नहीं मिल पाया है। लेकिन वह एक अलग कहानी है। असली कहानी यह है कि भाजपा में वापसी के एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी पार्टी में उनका नेतृत्व मजबूत नहीं हुआ है और न वे पार्टी को मजबूती दिला पाए हैं।

पार्टी में उनके कमान संभालने के बाद तीन सीटों पर उपचुनाव हुए और तीनों पर भाजपा हारी। हालांकि पहले भी भाजपा इन सीटों पर हारी ही थी लेकिन मरांडी के आने के बाद माना जा रहा था कि भाजपा की स्थिति मजबूत होगी। पर बाबूलाल मरांडी के असर का इलाका माने जाने वाले दुमका में भी दुमका विधानसभा सीट पर वे भाजपा को जीत नहीं दिला सके। बोकारो की बेरमो सीट पर भाजपा हारी और अभी गोड्डा की मधुपुर सीट भी भाजपा हार गई है। मधुपुर सीट के लिए तो मरांडी और उनकी टीम ने जबरदस्त जोर लगाया था। सांसद निशिकांत दूबे पूरी ताकत से लड़े थे क्योंकि वे स्थानीय सांसद हैं और उनके कहने पर बाहर से आए गंगाचरण सिंह को पार्टी ने टिकट दिया था। इसके बावजूद भाजपा वह सीट नहीं जीत सकी। सो, पार्टी में उनके और उनके करीबी रहे प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। दो पूर्व मुख्यमंत्रियों रघुवर दास और अर्जुन मुंडा के संगठन के कामकाज से दूर रहने की वजह से भी प्रदेश में भाजपा कमजोर हुई है।

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